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सोमवार, 27 अक्टूबर 2008

बेतुकीः मां लक्ष्मी का सालाना निरीक्षण आज

राम-राम सा। आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। यह पर्व आप सभी के लिये मंगलमय हो। अब कुछ बेतुकी हो जाए।
दास जी के पुत्र को एक्जाम में दीपावली का निबंध लिखने को दिया गया। बालक मन ने इतना अच्छा निबंध लिख दिया कि मास्टर जी प्रसन्न हो गये। बोले बेटा तुझे बी.एड., पीएचडी करने की कोई जरूरत नहीं। महान पिता की महान संतान, तुम तो लोगों को भाग्य विधाता बनोगे। निबंध इस प्रकार था।
दीपावली मैया लक्ष्मी को मनाने का त्यौहार है। मैया लक्ष्मी बहुत दयालु हैं, कृपालु हैं। वह साल में एक दिन वार्षिक निरीक्षण पर निकलती हैं। सालाना निरीक्षण के लिये उन्होंने अमावस की काली रात को चुना है। इस सालाना निरीक्षण के लिये लोग घरों की सफाई करते हैं। जो अमीर हैं वो हर साल हर कमरे में महंगा वाला डिस्टेंपर करवाते हैं और जो गरीब हैं वो चार साल की गारंटी वाला डिस्टेंपर करवाते हैं। उनसे भी ज्यादा गरीब चूने से काम चलाते हैं। गांवों में लोग गाय-भैंस की पॉटी से भी काम चला लेते हैं। इस प्रक्रिया को ठीक वैसे ही समझा जा सकता है जैसे कोई वरिष्ठ अधिकारी सरकारी दफ्तर में सालाना निरीक्षण पर जाता है। इसके लिये अधिकारी कार्यालय को साफ कराते हैं। कमीशन वाले ठेकेदार से आफिस की पुताई करवाते हैं।
रंगाई पुताई के बाद घर के बाहर खूब सारी लाइटें और झालर लगायी जाती हैं। जब से चाइना वालों को दीपावली के बारे में मालूम पड़ा है उन्होंने 25-30 रुपये की झालर बेचकर बड़ी-बड़ी कम्पनियों की बत्ती गुल कर दी है। ये झालर सामान्य तौर पर सीधे बिजली के खम्भे पर जम्पर डालकर लगायी जाती है। चोरी की बिजली से झालर जलाने का आनन्द ही कुछ और होता है। झालर लगाने के बाद रात को मैया का पूजन किया जाता है। हमारे देश में पुरानी कहावत है, पैसा ही पैसे को खींचता है। इसी लिये लोग मैया के सामने चांदी-सोने के सिक्के रखकर पूजा करते हैं।
दीपावली का महत्व अधिकारी और प्रभावशाली लोगों के लिये विशेष होता है। कई अधिकारी तो साल भर तक आने वाले गिफ्ट का इंतजार करते रहते हैं। जितना बड़ा अधिकारी उतने ज्यादा गिफ्ट। शहरों में अक्सर देखा गया है कि लोग अपने घर में मिठाई का डिब्बा भले ही न ले जाएं पर अधिकारी को खुश जरूर करते हैं। जिस अधिकारी से जैसा काम पड़ता है वैसे ही गिफ्ट उसे दिये जाते हैं। ठेकेदार अपने-अपने विभागों के अफसरों को खुश करने के लिये मिठाई और पटाखे ले जाते हैं। एक बार अफसर खुश तो साल पर बल्ले-बल्ले। इन लोगों को मानना है कि मां लक्ष्मी साल में एक ही दिन के भ्रमण पर निकलती हैं बाकी के 364 दिन तो वह उन्हीं के यहां रहेंगी।
मैया के आने के इंतजार में कुछ लोग अपने घरों के दरवाजे खुले छोड़ देते हैं। इन लोगों के घरों में चोरी हो जाती है तो भी यह समझते हैं कि मैया ने पुराना माल बाहर निकला दिया अब नया भिजवायेगी। यह त्यौहार उन लोगों के लिये बहुत ही बढ़िया है जो जुआ खेलते हैं। मैया ताश के पत्तों से होकर उनके घर का दरवाजा खटखटा देती है।
इस त्यौहार का लाभ उन लोगों को भी है जो किसी न किसी रूप में सरकारी हैं। यही कारण हैं कि अपनी दीपावली मनाने के लिये दूसरों का जेब तराशना जरूरी है। खर्चे बढ़ते हैं तो छापे भी मारने पढ़ते हैं। अफसर को भी घर पर मिठाई चाहिये। उस बेचारे को भी अपने बड़े संतुष्ट करने होते हैं। बिजली वाले चोरी रोकने के लिये बागते हैं। जहां चोरी न हो रही हो वहां जम्पर डालकर चोरी करवाते हैं फिर खुद ही छापा मार देते हैं। इन्हीं लोगों ने कहावत बनायी है चोर से कह चोरी कर और सिपाही से कहो जागते रहे। अक्लमंद लोग साल में एक बार ही इतने गिफ्ट ले लेते हैं कि बाद में जरूरत ही न पड़े क्योंकि दीपावली गिफ्ट भ्रष्टाचार नहीं होता। यह तो सदाचार होता है।पूजा करने के बाद लोग अपने पैसे में खुद आग लगाते हैं और तालियां बजाते हैं। यह काम कालीदास जी से प्रेरणा लेकर किया जाता है। कालीदास जी जिस डाली पर बैठते थे उसी को काटते थे। इस दिन गणेश भगवान की भी पूजा होती है। लोग गणेश जी से कहते हैं कि वह अपने चूहे को समझायें कि वह दूसरे घरों से लक्ष्मी मैया को लेकर आयें।
उपसंहार
इस तरह से साफ है कि दीपावली सभी को खुश करने का दिन होता है। बड़ी-बड़ी कम्पनियां भी अपनी दीपावली मनाने के लिये गिफ्ट पैक भी बाजार में लाती हैं।
पंकुल

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2008

अप्रेरक प्रसंगः दास न रहे उदास

भ्रष्टाचार की मूर्ति दास जी नित्यकर्म के बाद जैसे ही चिलमन से बाहर आये चमचे दहाड़ मारते उनकी तरफ दौड़ पड़े। दास जी ने तनिक प्यार से पूछा, भैये चमचों क्या परेशानी है। दो-तीन-चार नम्बर के काम के धनी चमचे ने मुंह खोला, महाराज महंगाई मार रही है। दास जी ने चुटकी ली, काहे, दीवाली की मिठाई नहीं देने का इरादा है। कहां महंगाई है। सुबह से कुल्ला तक नहीं किया हूं और दो दर्जन से ज्यादा भक्त मिठाई दे गये हैं। एक-एक भक्त ने कितना खर्च किया मालूम है, कम से कम पच्चीस-तीस हजार। अरे भाई कोई हमारे लिए कपड़े लाया तो कोई अपनी चाची को खुश कर गया। तुम इतना महंगाई-महंगाई गिड़गिड़ा रहे हो, अभी चार ठौ ठेके नहीं दिलाये तुम्हें। घर में पैसा नहीं तो ठेके वापस कर दो।
लगता है तुम विपक्ष से जा मिले हो। कोई काम-बाम नहीं अफवाहें फैला रहे हो।
एक दूसरे चमचे ने हिम्मत जुटाई। बोला महाराज आपके लिए महंगाई नहीं है लेकिन अफसरों को भी हमई से दीवाली शुभ करनी है। ठेके मिलने के बाद सामान महंगा हो गया। रेत में रेत मिलाने की भी गुंजाइश नहीं बची है। सीमेंट का कट्टा दिखा कर काम चल रहा है। दास जी ने कहा, चमचे इसमें परेशान होने की कोई बात नहीं है। सरकार किसकी, हमारी। जांच कौन करेगा हम। किसने कहा तुमसे काम करो। ठेका लो और कमीशन भेंट करो। तुम्हारी दीवाली में रौनक रहे और हमारे बच्चे टापते रहें, यह नाही होगा ना।
दास जी ने मुस्कराते हुए समाधान बताना शुरू किया तो चमचे उनके चारों ओर चुपचाप बैठ गये। दास ने भ्रष्ट वचन देना शुरू किया तो सन्नाटा पसर गया। दास जी ने गंभीर मुद्रा में कहा जिस तरह सूरज पूरब से निकलता है यह सत्य है उसी तरह तुम हमारी दीवाली मनवाओगे यह सत्य है। महंगाई बढ़ी कोई बात नहीं, सामान और कम डालो। और मुसीबत आये तो काम ही मत करो। हम हैं न झेलने को। तुम तो बस नोट छापो और हमें दो।
दीवाली साल में एक बार इसलिये आती है जिससे लोग अपने सुख (गिफ्ट) दूसरों को बांट सकें। मिठाई के नाम पर लीगल रिश्वत ले सकें। भगवान ने हमें सरकारी बनाया है। जो सरकारी होता है उसकी दीपावली तुम जैसे चमचे ही मनवाते हैं। भविष्य में ध्यान रखना हर अधिकारी को उसकी औकात के हिसाब से संतृप्त जरूर करना। तुम जैसे चमचों का जन्म ही हम जैसे लोगों के लिये हुआ है। यह कहकर दास जी कमरे में प्रवेश कर गये और चमचे उनकी दीपावली की तैयारी की वाह-वाह करते हुए उठ कर चले गये।
पंकुल

बुधवार, 22 अक्टूबर 2008

लगे रहो राज भाई

राज भाई, यों ही लगे रहना। किसी से डरने की जरूरत नहीं। आखिर किसकी मजाल जो तुम्हारी बिना बाल की मूंछ टेड़ी कर सके। राजेश खन्ना का गाना नहीं सुना, कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना। छोड़ो बेकार की बातों में, बीत न जाए रैना। तुम तो पुरानी कहावत के सहारे ही जीना। यानि सुनो सबकी और करो मनकी। अरे भाया तुम्हें कौन महाराष्ट्र के बाहर राजनीति करनी है। जितनी सीटें मिलेंगी, महाराष्ट्र में ही मिलेंगी। कुछ नहीं तो कम से कम दस-पांच हजार वोट तो बढ़ेंगे ही। ये चिन्ता उन्हें करने दो जो राष्ट्रीय दुकान चला रहे हैं। तुम्हारी ठेठ महाराष्ट्री दुकान है वही माल बेचो जो बिके। अब गंजों के शहर में कोई कंघे तो बेचेगा नहीं।
राज भाई, अभी तक तो बाहर के आदमियों को मार-मार कर निकाला है। अब सबसे पहले बाहर की भैंसों को लात मारकर निकाल देना। सभी भैंसों का डीएनए टेस्ट करा लेना। किसी के दादा-परदादा भी यूपी., बिहार के निकल आयें तो डंडे सहित बाहर का रास्ता दिखा देना। अपने ब्लड का भी एक बार टेस्ट तो करा ही डालना। पता नहीं कब रेस्ट आफ इंडिया की गाय-भैंस का दूध पी लिया हो। जाने-अनजाने किसी टाफी, चाकलेट में ही बाहर का दूध अंदर चला गया हो। बड़ी दिक्कत हो जाएगी। एक काम और जरूर करना, जितनी भी परचून की दुकान हैं उनमें रके सामान को भी चेक कर लेना। बाहर का बना हो तो आग लगा डालना। अरे कम से कम यूपी और बिहार की दाल, आटा, चावल, मेवा, मिश्री मत खाना। भैया कन्हैया जी को भी मत याद करना, वह भी बेचारे यूपी के ही थे।
अपने घर की छत, दीवार और ईंटों को खुदवाकर एक बार जरूर देख लेना। कहीं उसमें यूपी, बिहारी या बिलासपुरी मजदूर के पसीने की दुर्गन्ध तो नहीं आ रही। अपने चेलों का भी डीएनए जरूर करा लेना, कहीं उनके मां-बाप तो उत्तर प्रदेश, बिहार के नहीं थे। तुम्हें कमस है पूरे महाराष्ट्र में बाहर की कोई निशानी मत छोड़ना। कभी उस ट्रेन में मत बैठना जो इधर से होकर जाती हो। इतना तो देख ही लेना, कहीं उसका ड्राइवर तो बिहारी नहीं है। प्लेन में बैठो तो आस-पास बिहारी को देखते ही ऊपर से कूद जाना। अबकी जब क्रिकेट टीम का कोई खिलाड़ी रन बनाये तो ताली बजाने से पहले उसका प्रदेश जरूर पता कर लेना। तुम्हें कसम है, राज भाई। भूल से अगर इधर की मिट्टी भी मिल जाए तो उसे इधर ही भिजवा देना। कोई बात नहीं, अगर कुछ दिन जेल में भी रहना पड़े तो कोई बात नहीं, ये सब लोग तो तुम्हारी तरक्की से जलने वाले हैं। बेस्ट आफ लक। जिन्दगी भर एक दड़बे में ही रहना।
पंकुल

सोमवार, 20 अक्टूबर 2008

अप्रेरक प्रसंगः दोस्त वही जो प्रभावशाली

एक समय की बात है, दास जी अपने सरकारी बंगले के गार्डन में ध्यानस्थ बैठे थे। चारों ओर शांत मुद्रा में चमचे उनके इस रूप को देखकर गार्डन-गार्डन हो रहे थे। चारों ओर चमचों की बढ़ती भीड़ देख दास जी ने आंख खोल दीं। प्रसन्न मुद्रा में बोले, चमचों आज क्या समाचार है। एक चमचा बोला महाराज दोस्त और दुश्मन में क्या फर्क है।
दास जी के माथे पर सिलवटें बढ़ गयीं। गहन विचार के बाद बोले चमचे तुम्हारा सवाल अति उत्तम है। पूर्व में महाभारत के समय भी इसी तरह के प्रश्न के चक्कर में अर्जुन परेशान थे। दास जी के मुख से निकलते शब्दों को सुन चमचे कुछ और नजदीक आ गये। दास जी ने कहा दुनिया में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता है। जिस हाथ से आप साइकिल को फेंक देते हैं वही हाथ साइकिल चलाता भी है। जिस हाथी से अच्छे-अच्छे डरते हैं वह भी दोस्त हो सकता है। राजेश खन्ना ने कहा था, मिथुन चक्रवर्ती ने कहा था। हाथी मेरा साथी। जब हाथी साथी हो सकता है तो दोस्त ही हुआ। ये अलग बात है जब हाथी को पानी पीना हो तो वह हैण्डपम्प से भी पी सकता है। जिस तालाब में कमल के फूल खिलते हैं उसका पानी खत्म भी कर सकता है। हाथी दयालु भी बहुत होता है। वह कभी कमल के राखी भी बांध देता है।
यही कारण है कि हाथी से तालाब में खिल रहे कमल डरते हैं। उन्हें हाथी की दुश्मनी से डर लगता है। डरता हाथ भी है। साइकिल हाथी से तेज नहीं चल सकती। साइकिल को भी हाथी से डर लगता है। इसलिए सब डरने वाले दोस्त होते हैं। साइकिल को हाथ का सहारा तो कमल को हैण्डपम्प का। हाथी जितना पानी पीयेगा उसका थोड़ा बहुत तो तालाब में हैण्डपम्प से भर ही जाएगा। साइकिल अगर गिरी तो हाथ का सहारा मिल ही जाएगा। लेकिन जब हाथी की सांस फूले, वह बीमार सा हो जाए। उसकी वोटें (सांसे) बंद होने लगें तो वह साइकिल की सवारी भी कर सकता है। हाथी को हाथ घास भी खिला देता है।
अचानक के चमचे के जेहन में सवाल कौंधा। महाराज जब सब घालमेल है तो सभी दोस्त क्यों नहीं हो जाते। दास जी वोले, बेटा जब सब बाहर वाले एक हो जाएंगे तो अंदर वाले बाहर जाने लगेंगे। यह तो अटल सत्य है। किसी का कल्याण जब साइकिल पर बैठकर नहीं होता तो वह कमल को देखकर ही आत्मविभोर हो जाता है। एक चमचे ने कहा, महाराज जब हाथी विशाल है तो उससे लोग लड़ते ही क्यों है। दास जी बोले, चमचे। यह दोस्ती और दुश्मनी तो असल में नजरों का फेर ही है। कब बाहर वाला अंदर दोस्ती निभाये यह पता ही नहीं चलता। ऐसे दोस्तों को छुपा रुस्तम कहते हैं। रुस्तम कब छिपकर विभीषण बन जाए पता ही नहीं चलता।
अंत में दास जी बोले, बेटा दोस्त उसको मानना जो प्रभावशाली हो। दुश्मन उसको मानना जो तुम्हारा कुछ बिगाड़ न सके। इस सूत्र पर चले तो बल्ले-बल्ले होगी, वरना...
दास जी के इस गूढ़ वाक्य को सुनकर चमचे वाह-वाह कर उठे।
पंकुल

शनिवार, 18 अक्टूबर 2008

मैं कुत्ता(3)- क्षेत्रवाद हमारी पहचान






दोस्तों बहुत दिनों के बाद मुलाकात हो रही है। हम कुत्तों की आदत ही कुछ ऐसी है कि जहां एक बार पंजों से मिट्टी उड़ाकर बैठे तो झपकी लग ही जाती है। खैर बात हो रही थी हमारी कुत्तानीयत की। अरे जब इंसानों की नीयत को इंसानीयत कहते हैं तो कुत्तों की नीयत को और क्या कहेंगे। हम कुत्ते सदा से क्षेत्रवादी रहे हैं। इसे दूसरी तरह ऐसे भी समझा जा सकता है कि हम कुत्ते विस्तारवादी नहीं होते। एक मोहल्ले से निकलकर हम ज्यादा इधर-उधर भागते ही नहीं है। जब जाते भी हैं तो दूसरे कुत्ते टांग खिंचाई कर देते हैं।


इंसानों में यह सगुण हम से ही ट्रांसफर हुआ। हर कोई अपने ही मोहल्ले में घूमता है। जिस इंसान को जिस विभाग में ठेके लेने होते हैं वह उन्हीं अधिकारियों के आगे पूंछ हिलाता है। जब ठेके लेने के लिये दूरे विभाग में जाता है तो वहां उसकी कुत्ता खिंचाई होती है। मोहल्ले के कुर्ताधारी अपने क्षेत्र में ही भाषण देते हैं,दूसरे क्षेत्र में जाने की हिम्मत कुछ बिरले ही करते हैं। आप लोगों को इस काम में दूसरे कुत्ते सारी इंसानों का सहयोग मिल जाता है। इस मामले में यहां कुत्तानीयत हमारे यहां विशुद्ध है। हमने तो सुना है आप लोगों ने अपनी-अपनी पार्टियों के भी मोहल्ले बना लिये हैं। चलो अच्छा ही है। हमारी व्यवस्था विशेष है और इस व्यवस्था में बुरा मानने वाली कोई बात भी नहीं है। हम अगर इस व्यवस्था, इस अनुशासन को नहीं मानेंगे तो आपकी तरह अव्यवस्था फैल जाएगी। आप लोग तो जहां मन हुआ वहां मोहल्ला नीति का पालन करते हो और जब अपना फायदा हुआ तो तुरंत राष्ट्रव्यापी हो जाते हो। हमारी व्यवस्था से खाने का संकट कभी नहीं आता। हमारे मोहल्ले के लोग जानते हैं किस-किस कुत्ते को खाना देना है। सुरक्षा का संकट भी नहीं आता। कोई हमारे बहन-बेटी की अस्मत पर हमसे बिना पूछे हाथ भी नहीं डाल सकता। पर आप तो जानते ही हो, आखिर हम कुत्ते ही जो ठहरे। कभी-कभी प्रेमालाप के लिये दो मोहल्लों की सीमा तोड़ दी जाती है। यह तो वैसे ही समझो जैसे मैत्री बैठक हो रही हो। हकीकत ये है कि असल कुत्ता हमेशा क्षेत्रवादी होगा। हमें अपने इस क्षेत्रवादी या यूं कहें मोहल्लावादी होने पर हमेशा गर्व है। हमारे यहां मोहल्लावाद इतना शक्तिशाली है कि जातिवाद आता ही नहीं। हम तो ऐसे जानते हैं जैसे टामी नुक्कड़ वाला, कालू हलवाई वाला, राज्जा दारू वाला, भूरा अंडेवाला...। इसमें कोई कोटा भी फिक्स नहीं है। इतना तय है कि भूरा के बच्चे अंडे की ठेल के आस-पास ही घूमेंगे और राज्जा के दारू वालों द्वारा छोड़े गये दोने ही चाटेंगे।
(more)

पंकुल

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2008

पुज गये महाशय

पुज गये महाशय। सौभाग्य की बात है हर विलुप्त प्राय वस्तु की तरह आपका का भी एक दिन आ ही जाता है। सुबह से इठलाने का आनंद ही कुछ निराला है। शाम हुई और भूखी-प्यासी पत्नी ने जब चंद्रमा को याद किया तो आप साक्षात सिर से पांव तक कांप गये होंगे। जब पत्नी ने आपके पांव छुये होंगे तो आपका रोम-रोम सिहर गया होगा। ऐसा ही होता है। जब अचानक खुशी किसी को मिले तो यह आभास स्वाभाविक है। महाशय, साल भर पर्यावरण दिवस, साक्षरता दिवस , हिन्दी दिवस और न जाने कितने-कितने दिवस मना डालते हैं तब कहीं जाकर यह अनुभूति देने वाला दिवस आता है। कहते हैं, घूरे के दिन भी फिरते हैं। सो अपने और आपके भी हर साल एक दिन ही सही फिर ही जाते हैं। शायद इसी दिन को देखकर किसी ने पति परमेश्वर की कहावत का ईजाद कर दी होगी।
कुछ भाभियों, आंटियों को दिक्कत होती है कि पति के पूजन का दिन तो भगवान ने बना दिया, पत्नी पूजन का क्यों नहीं। भैये उन आंटियों और भाभियों को मेरा नमन। पर कभी सुना है कि सांस लो दिवस मनाया जाए। कोई खाना खाओ दिवस या स्नान दिवस आदि भी कभी मनाता है। यह सारे कार्य नित्य हैं। बेतुकी महा ग्रंथ में भगवन दास जी ने स्पष्ट किया है कि जो चीज नित्य-निरंतर है उसका दिवस मनाने की कोई आवश्यकता नहीं है। जिसकी उपलब्धता खतरे में हो उसको याद रखने के लिये साल में एक दिन निर्धारित करना धर्म परक है।
वैसे महाशय, मेरा एक सुझाव है। पुजने की परम्परा तो ठीक पर ज्यादा कड़ाई से पेश मत आना। आप तो एक दिन के परमेश्वर ठहरे, 365 दिन का परमेश्वर भी ज्यादा कड़ाई नहीं बरतता। कहीं ऐसा न हो सौ सुनार की और एक लुहार की। आशय समझ ही लिया होगा। भविष्य में ध्यान रखिये और साल में एक दफा पुजते रहिये।
पंकुल

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2008

बेतुकीः फिर निपट लिये रावण जी

फिर निपट लिये रावण जी। आपके सालाना निपटान दिवस पर आपके पुतले खूब धू-धू कर जले। अरे आपको साक्षात निपटाने की तो किसी में हिम्मत है नहीं। आपके पुतले को जलते हुए देखकर ही अपन तो पुरुषार्थ दिखा देते हैं।
भाई दसानन किसी जमाने में आपके दस सिर हुआ करते थे। आपने एक ही भूल की और अपने पूरे खानदान को मरवा दिया। हो सकता है आपकी यह गलती इन दस सिरों की वजह से ही हो गयी हो। अब दस-बारह पार्टियों के नेता सरकार बनाने के बाद भी एक जैसा नहीं सोच सकते तो आपके दस सिर कैसे सोच सकते थे। आपके किसी एक सिर ने सोचा होगा और आपने किडनेपिंग की योजना बना डाली। दूसरे सिर को इतना मौका तो दिया होता कि वो भले-बुरे की सोचता।
लंकाधिपति, आप अपनी सरकार चलाने के लिए कैसे सोचते थे। कम से कम इतना तो कर ही सकते हो कि थोड़ा सा ये गुर भी नेताओं को दे दो। नेताओं को आपने किडनेपिंग का गुर तो सिखा दिया। सीता हरण की तरह महिलाओं के अपहरण में भी निपुण बना दिया। मैंने सुना है आपके दस सिरों में एक सिर विद्वान का था। लगता है राम का वाण लगते ही आपके विद्वान सिर मुक्ति मिल गयी। बाकी बचे नौ सिर हर बार छह नये रूप में पुनर्जन्म लेते रहे। तभी तो आज आपके नौ सिरों के करोड़ों रूप पैदा हो गये। आपने लंका में घर बनाया था। अब तो हर शहर, हर गली में आपके नौ सिरों के अवतार पैदा हो गये हैं। सड़क चलते कब कौन सा रावणावतार प्रकट हो जाए पता नहीं।
जैसे आप वेश बदलने में माहिर थे, वैसे ही आपके अवतार भी हैं। कभी वोट की भिक्षा लेने के लिए घर-घर चक्कर लगाते हैं तो कभी किसी और रूप में।
हे रावण। इतनी शिक्षायें आपने दीं तो कम से कम एक शिक्षा और दे देते। आज के मिलीजुली सरकार के युग में एक सिर ऐसा पैदा कर देते जो कम से कम ढंग से सरकार तो चला लेता। हम आपको हर साल मारते रहेंगे। हर साल गली-मोहल्ले में तुम्हारा जुलूस निकालते रहेंगे जब तक तुम पूरे न निपट लो या हमें न निपटा दो। आपको निपटाने के लिए अभी तो राम जी को भी आने की फुर्सत नहीं दिख रही। यह भी हो सकता है इतने सारे रावणों को निपटाने में अकेले श्रीराम को प्राबलम आ रही हो। खैर, जो भी हो, हम तो इंतजार ही करेंगे।
पंकुल

मृग मारीचिका

दुनियां के इस रेगिस्तान में
ये मेरे निसां
आंधी के इक झोंके में
मिट जाएंगे।
फिर रह जायेगी इक सूनी जमीं
और चतुर्दिशा में बढ़ता
अंजान लोगों का काफिला
जो छूना चाहता है
वह मृग मारीचिका
जिसकी तलाश में मैंने
उम्र तमाम की।
और न जाने कितने लोग
दफन हैं इस रेगिस्तान में।
पंकज कुलश्रेष्ठ

रविवार, 14 सितंबर 2008

बेतुकी - बहुत याद आती है तुम्हारी

कसम से, तुम्हारी बहुत याद आती है। बिल्कुल हर्ट से कह रहा हूं। यों भी कह सकता हूं, तुम्हारी याद में आंसू बहा रहा हूं। अपने प्रियजनों की तरह हर साल तुम्हारी याद करता हूं। दर्जन, दो दर्जन लोगों से तुम्हारी तारीफ भी करता हूं। पर मुकेश का एक गाना मेरे रग-रग में बसा हुया है। जो चला गया उसे भूल जा। मैंने इसी लिए तुम्हें हमेशा भूलने की कोशिश की। मैं जानता हूं जाने वाले कभी लौट कर नहीं आते। पर रस्मों-रिवाज भी टाले नहीं जा सकते हमने आज भी यही कहा, ओ जाने वाले हो सके तो लौट कर आना।
इन्हीं रस्मो-रिवाज के बीच जब हमें चार लोगों के बीच भषणियाना पड़ा तो बहुत डिफीकल्टी फील हुआ। पर हमने भी शुरूआत से ही जो कहा, सभी वैरी गुड-वैरी गुड कहते नजर आये। हमने शुरूआत की, आई लव हिन्दी। नेचुरियली हिन्दी, हिन्दुस्तान की लेंग्वेज है। हम सभी लोगों को हिन्दी को प्रमोट करना ही चाहिए। कम से कम एक दिन तो हम हिन्दी की याद में बिता ही सकते हैं। आई फील, हिन्दी में डेली काम करना परेशानी का सबब हो सकता है। आज हमें विश्व में तरक्की करनी है तो अंग्रेजी को भी उतना ही सम्मान देना होगा। बट, ऐसा नहीं कि अंग्रेजी बोलने से हिन्दी का अस्तित्व खत्म हो जाएगा।
इसी बीच वहां बैठे मेरे अजीज ने मेरा समर्थन किया। बोले, कम से कम अपने मजदूरों से बात करते वक्त तो हमें हिन्दी में ही बात करनी चाहिए। तभी एक भाई बोले,सर क्या बतायें, हिन्दी बहुत ही फनी लेंग्वेज है। मैंने तो अपने बच्चों को भी कहा है कि हिन्दी जरूर सीखें। मेरी बिटिया बता रही थी ट्रेन को लौह पथ गामिनी कहते हैं। मीटिंग में बैठे सभी दोस्त एक साथ बोले व्हाट फनी। आओ चलो अब मीटिंग को खत्म कर दिया जाए।
लास्ट में वी आल लव हिन्दी। जोर से कहो, वी आल लव हिन्दी।
थैन्क्यू।
और अंत में, मैं जब इंटर में पढ़ता था तो मेरे एक मित्र ने दो पंक्तियां सुनायी थीं। इन पंक्तियों के लेखक से अनुमति सहित यहां प्रस्तुत करना चाहूंगा
हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दीजैसे प्रश्नवाचक चिन्ह के नीचे लगी बिन्दी


पंकुल

शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

अप्रेरक प्रसंगः कपड़ों से फर्क पड़ता है

कुछ समय पहले ही बात है। दास जी अपने सरकारी बंगले के अंतःपुर में विश्राम कर रहे थे। आस-पास चमचों की चटर-पटर रोजाना की भांति ही माहौल को चमचामय बनाने में सफल हो रही थी। प्राचीन समय के इद्रलोक की भांति ही अप्सराएं भी वहां मौजूद थीं। सोमरस का पान करते हुए दास जी इस अति सम्मोहनशाली माहौल को देखकर मंद-मंद मुस्करा रहे थे।
इसी दौरान एक चमचे के मन में कोई शंका पैदा हुई। शंका हो और दासजी उसका समाधान न करें ये असंभव बात है। चमचे ने किंचिंत सोचनीय मुद्रा बनाते हुए प्रश्न किया दास जी आखिर सभी नेता सफेद कपड़े ही क्यों पहनते हैं। प्रश्न बहुत ही गंभीर। चारों ओर सन्नाटा सा पसर गया। सभी चमचे एकटक दास जी के मुंह की ओर टुकुर-टुकुर ताकने लगे। जैसे वहां से वेदवाक्य अब फूटे कि अब फूटे। दास जी की मुद्रा बिल्कुल ऐसे जैसे कभी सूत जी की हुआ करती थी। प्राचीन काल में लोग सूत जी से इसी तरह के प्रश्न किया करते थे।
कुछ क्षण सोचने की मुद्रा के बाद दास जी ने अपना मुंह खोला। बोले चमचे तुमने बहुत ही नेक प्रश्न दागा है। मैं इस प्रश्न का उत्तर जरूर दूंगा। सुनो सफेद कपड़े पहनने के तीन मुख्य कारण हैं।
(1) हमारे समाज में प्राचीन काल से ही कपड़ों के रंग और ढंग का विशेष महत्व रहा है। राजा-महाराजा भी समय और परिस्थितियों के अनुकूल ही वस्त्र धारण करते थे। जब कभी शोक का माहौल होता था सफेद वस्त्र पहने जाते थे। आज जनता गरीब है और हमें हर समय शोक के माहौल में डूबा रहने पड़ता है इसलिए सफेद वस्त्र पहने जाते हैं।
(2)सफेद वस्त्र शांति का प्रतीक है। हमें हमेशा शांत रहकर ही दूसरों के घर में अशांति फैलाना पड़ता है। इसलिए सफेद रंग से बेहतर दूसरा रंग नहीं होता।
(3) सफेद रंग पर कभी भी कोई भी रंग आसानी से चढ़ सकता है। हमारा कोई भरोसा नहीं, सुबह लाल रंग में बैठे हैं तो शाम को केसरिया ओढ़ लिया। कभी हरा रंग नजर आने लगता है तो कभी लाल-हरे-नीले से प्रेम हो जाता है। बालक यही कारण है जब चाहे जो रंग मिले, सफेद पर पर तुरंत चढ़ा लो।
चमचे ये जवाब सुनकर बेहद प्रसन्न हुए, और दास जी वहां से अंतर्ध्यान हो गये।
पंकुल

गुरुवार, 11 सितंबर 2008

क्षणिकाएं

कशमकश
मैं हूं कि नहीं
जीवन इसी कशमकश में बीत जाएगा
सोचता हूं कुछ करूं
अपने अस्तित्व का आभास खुद करूं
दूसरों को करा दूं
सहारा बन सकूं किसी बेसहारा का
उतार फेंकूं ये लिबास पाखंडों के
पर क्या मैं यह कर सकूंगा
शायद हां या नहीं
जीवन इसी कशमकश में बीत जाएगा
मैं हूं कि नहीं।

पंकज कुलश्रेष्ठ

छोड़ तो स्वप्न स्वर्ग का इस धरती पर
छोड़ तो स्वप्न स्वर्ग का
इस धरती पर
अब बच्चों की चीखों
अबलाओं के आंसू
और मजबूरों की आहों से
नहीं डोलता सिंहासन इंद्र का
छोड़ तो स्वप्न स्वर्ग का
इस धरती पर
पहले द्रोपदी के अपमान का
बदला पांडवों ने लिया
अब तो पांडवों ने ही
द्रोपदी का चीरहरण किया
छोड़ तो स्वप्न स्वर्ग का
इस धरती पर

पंकज कुलश्रेष्ठ

बुधवार, 10 सितंबर 2008

राधा रानी का मना जन्मदिन




















भादौं की मस्ती मथुरा में पिछले दिनों छायी रही। जन्माष्टमी के बाद आठ सितम्बर को मथुरा के मंदिरों में कृष्ण प्रिया राधा रानी का जन्मदिवस मनाया गया। राधा रानी की जन्म स्थली रावल में राधा जी का दुग्धाभिषेक हुआ। इससे एक दिन पहले सात सितम्बर को बरसाना के श्रीजी मंदिर में श्रद्धालुओं की मस्ती देखते ही बनती थी। यहां छह सितम्बर से ही लोगों ने नाच-गाकर अपनी आराध्य श्रीजी राधा रानी को प्रसन्न करने का प्रयास किया। आप इस आयोजन में शरीक नहीं हुए पर मैं कुछ फोटोग्राफ यहां लगा रहा हूं जिन्हें देखकर आप संतुष्ट हो सकते हैं।
अंतिम फोटो रावल के मंदिर में राधा रानी के दुग्धाभिषेक का है।शेष चित्र श्रीजी मंदिर बरसाना और बरसाना में उमड़ी भीड़ और यहां की मस्ती के हैं।
पंकज कुलश्रेष्ठ

मंगलवार, 9 सितंबर 2008

अंतर

सावन और भादों, बरसात का मौसम। बड़े शहरों की तो नहीं मालूम लेकिन छोटे शहरों के लिए बारिश अक्सर मुसीबत लेकर ही आती है। हर बार बारिश और हर बार सड़कों पर भरने वाला पानी। इस पानी, यों कहें गंदे और नाले के पानी में बच्चों का कूदना और नहाना। सफाई की दृष्टि से इसे कतई उचित नहीं कहा जा सकता लेकिन.....
अंतर
ये झोपड़ियों में रहने वाले,
बरसाती नालों में नहाने वाले लोग,
हमसे तो कहीं बेहतर हैं।
पानी में बंद होने वाली गाड़ियों
नाले में डगमग कर गिरने वाले
बूढ़े और बच्चों को
ये खुद
बाहर निकाल लाते हैं
गंदे पानी में ये मन का मैल
पूरी तरह धो डालते हैं
पर एक हम हैं
कोठियों और बंगलों में रहने वाले
गंगा के साफ पानी में नहाकर
अपाहिज और लाचारों से बचते हुए
मंदिर का रास्ता ढूंढते हैं
कहीं वो हमसे छू न जाएं
हम साफ पानी में नहाकर भी
मन साफ नहीं कर पाते हैं
हमसे तो अच्छे वो हैं
जो गंदे पानी में नहाते हैं।
पंकज कुलश्रेष्ठ

रविवार, 7 सितंबर 2008

मैं कुत्ता (2)... वफादारी तुमने छीन ली इंसान


हम कुत्तों को वफादारी विरासत में मिली थी। मैं सतयुग से देख रहा हूं, कुत्ते आदमी तो आदमी, बिल्ली-बिलौटों तक के प्रति वफादार रहे हैं। जिस घर में कुत्ते-बिल्ली साथ-साथ रहते हैं वहां हमारी वफा का आंकलन किया जा सकता है। पहले तुम इंसानों ने भी हमसे वफादारी सीखी थी। अब हालात बिगड़ते जा रहे हैं। आप लोगों की तरह अब कुत्तों का भी भरोसा करना मुश्किल होता है। कई बार ऐसा होता है जब कुत्ता आपके पांव चाटते-चाटते ही पैर में काट लेता है। आप उसे रोटी खिलायें और वो गुर्रा कर भाग जाए। ऐसा भी नामुमिकन नहीं कि वही कुत्ता आपके घर के बाहर भौंकना ही छोड़ दे। और तो और ये भी हो सकता है कि चोर उचक्कों को भौंक-भौंक कर आपके घर के अंदर ही छोड़ आये। इसे हमारे यहां इंसानी फितरत कहते हैं। आप लोगों में तो पता नहीं कब कौन आपके पीछे चलते-चलते तंगड़ी मारकर आगे निकल जाए। कई पार्टियों के छुटभैये नेता इसी फितरत के चलते आगे बढ़ते हैं। जो लोग एक-दूसरे की गलबहियां कियें हों उनकी गारंटी नहीं कल भी साथ-साथ ही बैठेंगे।
आप लोगों की आदत होती है जिसकी थाली में खाओ उसी में छेद कर दो। कोई भला मानुस आपको घर पर खाने के लिये बुलाये और आप खाना-खाने के बाद इंकम टैक्स वालों को और भिजवा दो। नेताओं को चंदा देना हो तो अपने पड़ोसी का पता बता दो। हां जब नेताओं से काम निकलने हों तो उन्हें अपने घर पर बुलाकर तलुवे चाटो। एरिये का थानेदार जब तक पोस्टिंग पर रहे, उसकी जी हजूरी करो। जब थानेदार का तबादला हो जाए तो अपना मोबाइल बंद कर लो । बास का फोन आये तो तुरंत हलो करके मिमियाने लगो। जब किसी फोकटिया का फोन हो तो रांग नम्बर कहकर फोन रख दो।हमारे यहां भी ऐसा होने लगा है। जब पड़ोसी मोहल्ले का दमदार कुत्ता आता है तो सभी दुम हिलाते-हिलाते दूर-दूर चलते हैं। जब अपने मोहल्ले का मरियल कुत्ता भी आता है तो उसे फफेड़ डालते हैं। नेताजी चुनाव हार जाएं तो कोई पूछने वाला भी नहीं बचता। नेताजी मंत्री बन गये तो अड़ोसी-पड़ोसी के चमचे भी रिरियाने लगते हैं।
हम कुत्तों की तरह कुछ इंसान भी फालतू होते हैं। इन लोगों के पास भी सिर्फ अड़ोसी-पड़ोसी की घर में सूंघने के सिबाय कुछ काम नहीं। किसकी कितनी आमदनी है, किसके कितने बच्चे हैं और कौन क्या कर रहा है यह काम आप लोग करते हो। हमारे यहां आप किसी भी कुत्ते से पूछ सकते हैं किसके घर क्या बना है। जैसे आपको जो कमीशन दे दे उसका पता अपने बाप को भी नहीं बताते, ऐसे ही जो हमें रोटी देता है उसका घर नहीं बताया जाता।
जिसके दरवाजे पर आपको कमीशन मिलने की संभावना हो। जिसका नाम लेकर ही आपका काम थाने-चौकी में हो जाए आप उसी नेता के घर के आस-पास मंडराते हो। सुबह हो या शाम, नेताजी को खुश रखने का काम करते हो। जिसकी गाड़ी में दो -चार घंटे बैठने के एवज में दो पैग मिल जाए, थोड़ी सी बोटी खाने को मिल जाए वहीं पर भीड़ भी नजर आती है। अरे आप ही लोग कहते हो, जहां गुड़ होगा वहां चींटे तो आयेंगे ही। हमें भी जहां दो चुपड़ी रोटी मिल जाएं वहीं दुम हिलाते हैं। जिसके यहां ज्यादा अच्छी रोटी मिलेगी वहीं पर खड़े हो जाएंगे, बिल्कुल आपकी तरह। जो नेता ज्यादा अच्छा खिलायेगा उसके यहां खिसक जाएंगे। (क्रमशः)
पंकुल

शनिवार, 6 सितंबर 2008

बहुत निकले अरमां पर अभी तो कम निकले

भैया गयी भैंस पानी में। घबड़ाओं नहीं अभी जाने वाली है। हाथ का जो होना है सो तो होगा ही पर हाथ के इन चश्मेबद्दूरों का क्या होगा। बेचारे बड़े अरमान से साइकिल की घंटी बजा रहे थे। एक बेचारे, संगठन के मारे। बार-बार हारे। अपनी धर्मपत्नी को लखनऊ पहुंचाने की कोशिश भी की पर साइकिल ने बेचारे का हाथ कुचल दिया। सोचा अब तो कम से कम साफ्ट लायन पिघल जाएंगे। इसीलिये साइकिल के कसीदे कस रहे थे। मैडम तक से जुगाड़ लगवा ली। तरन्नुम में गा रहे थे, ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे। नेताजी को उम्मीद थी कि कम से कम उनका चांस तो लगेगा ही। पिछले बीस साल से पार्टी को वहां से यहां तक लाने में इनका भी कम योगदान नहीं है। जब जी चाहा, प्रदेश के आका बन गये। लम्बी से अचकन पहनी और घूम। अब अगर उनके कहने से कोई वोट नहीं डालता तो बेचारे का क्या कसूर है। अपनी तरफ से तो हमेशा कोशिश ही की।
पर लायन तो आखिर लायन है। शोले के गब्बर सिंह की याद दिला दी। मार दिया फिल्मी डायलाग। क्या सोच कर आये थे। सरदार सीट छोड़ देगा। तुम्हें सीट परोस कर अपने एम.पी. के हाथ में कटोरा थमायेगा। अरे किस-किस के लिये छोड़ेगा सीट। तुम्हारे गांव में तो सभी नेता हैं। हर कोई सीट के लिये जीभ लपसिया रहा है। हाथ की दुर्गति तो कर ली, अब आगे चांस मार रहे हैं। तमाम लम्बी अचकन वालों के अरमानों पर साफ्ट लायन ने पानी फेर दिया। भैया क्या बिगड़ जाता। दोस्ती की तो निभाते। अरे अपनी खातिर न सही हमारी खातिर ही निभाते।
पर साफ्ट लायन जानता है। जो औकात चचे ने हाथ की बना दी है उसकी साइकिल टनटना कर चल सकती है। मजे से चल सकती है। लायन ने इसीलिये रिंग मास्टर को कुछ नहीं कहा। रिंग मास्टर जब तक कब्जे में है तब तक लायन का पिंजड़ा दूर ही है। जितनी मंकी घुड़की से काम चल जाए उतना बढ़िया। एक कहावत याद आ रही है न मोकू और न तो कू ठौर। इस घुड़की से सबसे ज्यादा अपने छोटे चौधरी को दिलासा मिली है। अब रोजाना मंदिर में जाकर दीपक जलायेंगे। अरे चुनाव से भले ही दो महीने की जुगाड़ बने, बत्ती तो जले।
पंकुल

शनिवार, 23 अगस्त 2008

बेतुकीः बहुत मुश्किल में पड़ जाओगे कन्हाई

कन्हैया मजे में हो। मंदिर-मंदिर बगल में बांसुरी दबाये मुस्कराते हुए एक टांग पर खड़े-खड़े बहुत आनंद आ रहा है। सुबह शाम माखन मिश्री के भोग लग रहे हैं। महीने में छत्तीस बार छप्पन भोग चख रहे हो। हमसे तो कह दिया कर्म किये जा फल की इच्छा मत करना। अरे, अपन को फल तो क्या सूखी रोटी भी नसीब नहीं हो रही। हमें फल की कोई इच्छा भी नहीं। छप्पन भोग तुम्हीं खाओ। हमारे खाते में सुबह-शाम एक भोग ही कर दो, हम तो उसी में खुश हो जाएंगे।
वैसे जनाब, आप एक ही टांग पर क्यों खड़े हो जाते हो। शायद इसलिये कोई बुलाये तो तुरंत आ जाओ। द्वापर में भी तुम्हारी आदत ऐसी ही थी। मनसुखा ने आवाज लगायी और चल दिये। पढ़ाई-लिखाई की चिन्ता होती तो मैया घर से निकलने काहे देती।
तुम पर आज कल फिल्मी दबाव बन रहा है कि एक बार फिर आकर देखो। कोई कह रहा है, एक बार आजा, आजा, आजा। कुछ कहते हैं कन्हैया, कन्हैया तुम्हें आना पड़ेगा। तुम्हें बुलाने वाले दोनों ही तरह के लोग हैं। कुछ चाहते हैं लाखों कंसों का नाश हो जाए। लेकिन कंस चाहते हैं कि एक बार आकर तो देखो। तुम अपने दरवाजे पर खड़ी लाखों की भीड़ को देखकर कन्फ्यूज मत हो जाना। ये तो इसलिये आते हैं कि थोड़ी बहुत श्रद्धा भक्ति का प्रसाद उनकी तरफ भी खिसक जाए। ये लोग सुदामा से इंसप्राइड हैं। अपने साथ दोना भर प्रसाद लाते हैं। हर बार तो तुम्हारे पर रुक्मणि नहीं बैठी रहेंगी। कभी तो एक-दो इलाइची दाना खाओगे ही।
मेरी व्यक्तिगत सलाह है तुम भूलकर भी यहां मत आना। भाया भले ही तुम्हारे मंदिरों में करोड़ों की सम्पत्ति है। तुम्हारे हाथ में सोने-चांदी की बांसुरी और सिर पर मुकुट रहता है लेकिन बाहर आते ही ये सब गायब हो जाएगा। तुम्हारे नाम पर इंकम टैक्स बचाने वाले अपना-अपना माल ले उड़ेंगे।
तुमने तो सिर्फ गाय चराना सीखा था। अब तुम्हारी गाय माता तुम्हारे भर के लिये दूध दे दें तो गनीमत मानना। बेचारी का खुद ही ठिकाना नहीं रहा। हमने तो भैंस मौसी का इंतजाम कर रखा है। किसी गलतफहमी में मत रहना। दूसरों की भैंस खोलना आसान काम नहीं। हर झगड़े के बाद पूछना पड़ता है तुम्हारी भैंस खोली थी क्या। तुम जब छोटे थे तो पढ़ाई का टंटा नहीं था। अब तो सुबह पांच बजे उठते ही मैया पांच किलो का बस्ता पींठ पर टांग देगी। तुम्हारी आदत थोड़ी डिफर थी। घर से निकले और पहुंच गये क्रिकेट खेलने। गोपियों की मटकी फोड़ी और मक्खन चुराकर खा लिया। पहले तो मैया को गाना सुनाकर काम चल जाता था। तुमने कह दिया मैया मोरी मैं न ही माखन खायो और मैया मान गयीं। अब तो पुलिस अंकल का डंडा चलेगा तो बिना खाये ही बोल दोगे, मैंने ही माखन खायो। तुम्हारा नाम तो हर थाने की लिस्ट में आ जाएगा। हर तीज- त्यौहार पर थानेदार साहब के चक्कर लगाने पड़ेंगे। एक दो जमानती भी साथ रखना पड़ेगा।
बाकी तुम तो बहुत समझदार थे। अर्जुन को इतना बड़ा उपदेश दे डाला। अब आकर कंस मामा के थप्पड़ मारने की भी कोशिश न करना। एक साथ दर्जनों धारएं लग जाएंगी। अपने यहां सारा काम अब कानून ही करता है। कानून की आंखों पर हमने पट्टी बांध दी है। ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारे जमाने में गांधारी ने पट्टी बांध ली थी। गांधारी ने हमेशा देश का भला ही चाहा, वैसे ही हम भी चाहते हैं। अगर गांधारी न होती, तो धृतराष्ट्र अपने प्रिय दुर्योधन के पुत्र मोह में कैसे फंसते। अगर दुर्योधन न होते तो महाभारत न होती। महाभारत न होती तो तुम्हें गीता का उपदेश देने का बेहतरीन मौका कहां मिल पाता। तभी तो तुमने कहा था, जो हो रहा है, अच्छा है। होने वाला है वह भी अच्छा होगा। अब यहां आकर अपने गीता के उपदेश का अक्षरशः पालन करके दिखाना।
बहुत मुश्किल में पड़ जाओगे कन्हाई। हकीकत ये है नाटकों में तुम्हारा रास देखने वाले, तुम्हें गांव, गलियों में रास करने की इजाजत नहीं देंगे। तुम्हारे समय में सब लीगल रहा होगा। अब तो कोई गोपी ही थाने ले जाएगी तुम्हें। रोजाना अखबार में पड़ रहे होगे, प्रेमी की धुनाई। इसमें कई तो तुम्हारे रास से प्रेरित रहे हैं बेचारे।
मैं एक चीज तो भूल गया। तुम्हें ड्राइविंग का बहुत शौक था। तभी तो अर्जुन का रथ ड्राइव करने चले गये। अब तांगा चलाओगे तो थोड़ा बहुत कमा सकते हो। पर इतने भर से छप्पन भोग की जुगाड़ होने से रही। तुमने यमुना में कालिया को निपटाया। हमारे यहां अमिताभ बच्चन ने कालिया की ऐसी-तैसी कर दी। तुम यमुना के कालिया की बात करो तो हमने यमुना को इस काबिल ही नहीं छोड़ा कोई कालिया उसमें रहे।
तुमने अपने जमाने में एक बहुत बड़ी गलती की थी। खुद कहते रहे, आत्मा अजर-अमर है और खुद ही कंस और उसके भाई बंधुओं को मार दिया। हमने सुना है हर बार आत्मा छह गुनी हो जाती हैं। तभी तो तुम्हारे यहां का एक कंस इन सबा पांच हजार साल में लाखों तक पहुंच गया। खुद मोक्ष लेकर चले गये। अब कंस आता रहा और तुम सिर्फ मंदिर में, पोस्टर में मुस्कराते रहे। तुम आओ तो अपनी बांसुरी भी छोड़ आना। अब सड़क चलते लोग महिलाओं के गले की चेन नहीं छोड़ेते, तुम्हारी बांसुरी एक दिन भी नहीं बचेगी। न न। बांस वाली भी मत लाना। हम नहीं चाहते कोई तुम्हें नीरो कहे। नीरो को तो जानते ही होगे। कहा जाता है, रोम जल रहा था और नीरो चैन की बांसुरी बजाता रहा। हम इतने भी खुदगर्ज नहीं। हमें तो मुकेश दादा की याद आ रही है। मुझे तुमने कुछ भी न चाहिए, मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो। तुम तो भैया मंदिर में बैठे-बैठे अपना जन्मदिन एन्ज्वाय करो। सुबह शाम छप्पन भोग खाओ।
आखिरी शिकायत। तुमने सैकड़ों लोगों का संडे खराब कर दिया। बेचारे लगे हैं तुम्हारी सेवा शुश्रुभा में। चलो, सब चलता है। हैप्पी बर्थडे अगेन।
पंकुल

सोमवार, 18 अगस्त 2008

बेतुकीः चचा, कहां चले

बड़े बे आबरू होकर तेरे कूचें से हम निकले, अब तो बस ये सोच रहें हैं कि इधर निकलें कि उधर निकलें। अपने पड़ोसी मुशर्रफ चचा की हालत कुछ ऐसी ही नजर आ रही है। बेचारे, अपने घर में बेगाने हो गये। ऐसे भी कर्म नहीं किये कि पड़ोसी दो रोटी के लिये भी पूछे। इसीलिये कहा गया है, हमेशा आस-पड़ोस में शराफत से काम लेना चाहिए।
अपने दास चाचा तो इतने शरीफ हैं कि भाभी के चले जाने पर महीनों उनका अड़ोस-पड़ोस में ही चाटने-चटोरने में बीत जाता है। लेकिन मियां मुशर्रफ हैं कि माने ही नहीं। अरे, हमारे घर (आगरा) आये तो बहुत समझाया। भैया मान जाओ। पड़ोसी से ज्यादा कभी कोई काम नहीं आता। पर नहीं। ऐंठ ऐसी जैसे अमृत पीकर आये थे। सोचा था जब तक जीयेंगे सरकार में जीयेंगे। पड़ोसी छोड़ो, घर में भी किसी को नहीं छोड़ा। अच्छे-अच्छे तीसमारखां मैदान छोड़कर भागते नजर आये। अब खुदकी हालत खस्ता है। वैसे मियां मुशर्रफ की फितरत ही कुछ अजीब सी है। 1998 में बेचारे नवाज ने उन्हें सेनाध्यक्ष बनाया और एक साल में उन्हें ही खिसका दिया।
मियां अगर ठीक-ठाक काम किये होते तो अपन दिल्ली वाली हवेली में ही एक कमरा रहने के लिये दे देते। चक सुबह-शाम खाते और रात में सो जाते। पर तुम्हारा क्या भरोसा कब अंगुली पकड़कर पौंचा पकड़ लो। तुम्हें चचा कहकर कमरा दें और तुम चौके में चले आओ। न बाबा न। इतना बड़ा रिस्क नहीं लिया जा सकता। हां, बड़े चचा तुम्हारा साथ दे सकते हैं। बहुत खुसर-फुसर करते थे दोनों। उनके यहां जाकर सफेद घर में बाहर वाला कमरा मियां तुम्हारे लिये मुफीद रहेगा। सेनाध्यक्ष रहे हो, सैनिक की तरह काम करो। हमारे घर में नहीं, आस-पास भी नहीं रहना। वहीं चले जाओ, मजे में रहोगे। जब तक बड़े चचा कि सरकार है, तुम्हारे भी आनंद रहेंगे।
एक छोटा सा सुझाव याद रखना चचा। अबकी पड़ोसियों से ठीक-ठाक व्यवहार रखना। अबकी नहीं बनी तो घर का कोना तो दूर, बाहर भी कोई नहीं फटकने देगा। अच्छा, अलविदा। भगवान करे, फिर कभी न मिलें।
पंकुल

रविवार, 17 अगस्त 2008

मैं कुत्ता (1). .. पूंछ सीधी करके नाक नहीं कटानी


मैं कुत्ता हूं। अपने दास जी पिछले पांच सौ साल से रिसर्च करके नाक में दम किये हैं। पता नहीं हमारी निजी जिन्दगी में ताक-झांक करके उन्हें क्या मिल गया। चलो कोई बात नहीं। जब उन्होंने ताक-झांक ही कर दी है हम ही उनकी बात लिखे देते हैं।
मैं कुत्ता हूं। मेरी सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक साख तुम मनुष्यों से कुछ ज्यादा है। मेरा उल्लेख प्राचीन पुराणों में भी है। तुम्हारे इष्ट धर्मराज युधिष्ठर जब स्वर्ग गये तो मैं अकेला ही उनके साथ था। देवी-देवताओं के साथ भी मुझे अक्सर स्थान मिल ही जाता है। तुम जैसे स्वार्थी मनुष्य मेरे काले वर्ण की पूजा करते हैं। मैंने आज तक किसी मनुष्य की पूजा नहीं की।
मुझे सबसे ज्यादा परेशानी तब होती है जब लोग मेरी पूंछ के पीछे पड़ जाते हैं। तुम लोगों ने कहावत बना ली है कुत्ते की पूंछ टेढ़ी की टेढ़ी ही रहेगी। अरे हमने आज तक कभी आपकी मूंछ के बारे में कहा। हमारी पूंछ से आपको क्या लेना-देना। पूंछ हमारी शान है। जिसकी पूंछ जितनी घुमावदार और टेढ़ी समझो कुत्ता समाज में उसका उतना ही महत्व। दर्जनों कुत्ते उसके आगे-पीछे घूमते फिरते हैं। जैसे तुम लोगों के यहां लम्बे कुर्तों वालों की जमात होती है। जिसका जितना लम्बा कुर्ता उतना बड़ा नेता। तुम लोग अपने कुर्ते का साइज घटाते-बढ़ाते रहते हो। हमारे यहां यह सुविधा सामान्य तौर पर उपलब्ध नहीं है। वैसे जल्द ही ब्यूटी पार्लर खुल सकते हैं जहां हमारी पूंछ को टेढ़ा किया जा सकता है। ये तो तुम भी जानते हो हमारी पूंछ को सीधा भले ही नहीं किया जा सके, पर टेढ़ा करने में कोई परेशानी नहीं है।
ऐसा नहीं, हमारे यहां सीधी पूंछ वाले नहीं होते। कुछ बदकिस्मत सीधी पूंछ किये रहते हैं। ऐसे कुत्ते हमेशा दूसरों के पीछे ही घूमते रहते हैं। चापलूसी उनकी आदत में शुमार हो गया है। दरअसल जबसे हम कुत्ते आबादी के नजदीक आते जा रहे हैं मनुष्यों के दुर्गुण हममें समाते जा रहे हैं। कुत्तों को दो रोटी डाल कर तुम उन्हें दुम हिलाऊ बना लेते हो। ऐसे कुत्तों का हमने बायकाट करने का फैसला किया था लेकिन मतदान में वह प्रस्ताव गिर गया। जब दुम हिलाऊ कुत्तों की बात चली तो चिल्ल-पौं शुरू हो गयी। दुर्भाग्य तो ये रहा कि तमाम ऊंची पूंछ किये फिरने वाले कुत्ते भी बंद कमरे में दुम हिलाते ही नजर आये।
तुम्हारे मनुष्य समाज में यह प्रथा बहुत ही पुरानी है। तुम लोगों ने इस काम को सर्विस टैक्स बना लिया है। दलाली तुम्हारी आदत है। किसी की थाने में रिपोर्ट लिखवायी तो दलाली। किसी का ट्रांसफर करवाया तो दलाली। किसी की नौकरी लगवायी तो दलाली। किसी को ठेका दिलवाया तो भी दलाली। तुम्हारी इसी आदत के चलते गांव और मोहल्ले के कुत्तों ने दरवाजे-दरवाजे जाकर रोटी खाने की आदत डाल ली है। मैं सदियों से देख रहां हूं, गांव में कुत्ते दरवाजे पर रोटी के लिए जीभ निकाले बैठे ही रहते हैं। इन कुत्तों का अपना तो कोई ईमान नहीं। जब चाहे तब कोई इनकी दुम पर पैर रखकर चला जाए। बस दिखाने के लिये रात में थोड़ी सी भौं-भौं कर देते हैं। इसी भौं-भौं की दलाली में रोटी खाते-खाते इनकी उम्र बीतती चली गयी है।
शहरों में तो आपने और भी नरक कर दिया है। चेन से बांध कर जहां चाहा वहां खड़ा कर दिया। हमारी तो कोई निजी जिन्दगी ही नहीं रही। बच्चे-बच्चे तक हमारी दुम को पकड़ कर जहां चाहें वहां खींच ले जाते हैं। ये सब मालूम है सिर्फ इस पापी पेट के लिये कुछ कुत्ते कर रहे हैं। घर बैठे खाने की आदत जो पड़ गयी है। इन्हें अपनी दुम की भी चिन्ता नहीं रही। हमें बहुत बुरा लगता है कुछ मनुष्य दूसरों को कुत्ते की दुम की गाली देते हैं। हमने भी अपने यहां कहना शुरू कर दिया है मनुष्य की मूंछ। आप हमारी पूंछ से छेड़छाड़ बंद करो हम आपकी मूंछ को बख्श देंगे।
तुम्हें सच्ची बतायें। भले ही हम जैसे ऐंठीली गोल-गोल दुम वालों की बकत कुत्तों ने कम कर दी हो लेकिन तुम्हारी कसम आज भी जब कोई गबरू जवान निकल जाता है तो उसकी बात ही निराली होती है। और क्या बतायें, सड़क पर जब वो इठला-इठला कर चलता है तो ओर चारों कुत्ता बालाओं की लाइन लग जाती है। उसकी पूंछ की ओर देखकर तो तुम मनुष्य भी घबरा जाते हो। (क्रमशः)
पंकुल

शनिवार, 16 अगस्त 2008

बेतुकीः न बहना नजर आयीं न भैया

अपने चचा पिछले चौबीस घंटे से बहन और भैया को खोजते रहे पर न तो बहन नजर आयी न भैया। अरे गलत मत समझना। चचा की बहन ने तो उन्हें राखी बांधी। अपुन की बहन ने भी राखी के साथ खूब घेबर खिलाया पर लखनऊ वाली बहन का भाई नहीं आय़ा। भूल गये भैया को। याद करो। थोड़ा और दिमाग को खुजलाओ। नहीं आया पकड़ में। चलो अपन ही बके देते हैं।
एक समय की बात है, कमल वाले लाल हुआ करते थे। जब हाथी वाली बहन पर मुसीबत का पहाड़ टूटा तो भाई पहुंच गये राखी बंधवाने। भाई धर्म निभाया और गिफ्ट में दे दी सरकार। तब बहन मुसीबत में थी। अब बहना को भाई की याद नहीं आयी। अभी क्या पिछले कई सालों से बहन को भाई की याद नहीं आ रही। भाई पर हर कोई चपत लगाने के मूड है और बहन का दिल पिघल ही नहीं रहा।
एक तरफ हाथ साइकिल पर बैठा और चल दिया। बहना है न तो चाचा चौधरी को भाव दिया न ही कमल भैया को। चाचा ने बहुत मगजपच्ची की लेकिन दाल नहीं गली। बहना, कमल भैया पर तो तरस खाओ। अपने बडे़ वाले लाल से तो कम्पटीशन मत करो। बेचारे कितनी सर्दियों से नजर गड़ाये बैठे हैं। रोजाना बेचारे गाना गाते हैं, ये कुर्सी बहुत अच्छी लगती है। लेकिन कुर्सी है कि मानती ही नहीं। सोचा था कुर्सी वाले कन्हैया को तंगड़ी लगाकर खुद मटरगश्ती करेंगे। पर क्या मालूम था अपनी ही बहना भांजी मार देगी। बहना है कि मानती ही नहीं। जो कुर्सी भैया को अच्छी लगी वही बहना को चाहिए। अपने चचा सोच रहे थे कि शायद भैया फिर बहना को कुर्सी दान कर दें। और बहना को दान के लिए रक्षा बंधन से बढ़िया दिन क्या हो सकता था। पर न बहना नजर आई न भैया। चलो..हम इंतजार करेंगे...
पंकुल

गुरुवार, 14 अगस्त 2008

बेतुकीः आजादी की जवानी मुबारक

बधाई हो, अपन का लोकतंत्र 61 साल का जवान हो गया। अरे भैया जब च्यवनप्राश खाया है तो बूढ़ा काहे होगा। आप क्या सोच रहे थे बेचारा बुढ़ा गया हैं। भाई मेरे, जब अपने प्रधानमंत्री जवान हैं। भावी प्रधानमंत्री युवा और जोशीले हैं तो लोकतंत्र कैसे बुजुर्ग हो सकता है।
जबसे आजाद हुए जवानी बढ़ती चली जा रही है। जवान हैं तभी तो जिसे चाहे मार सकते हैं। किसी की मजाल तो हमारी जवानी के सामने आये। जिसकी जमीन चाहे छीन लें और जिसकी चाहें लौटा दें। हम स्वतंत्र हैं। सड़क पर जब सांड की तरह घूमेंगे तो जिसे चाहे उठा कर फेंक देंगे। हमारी जवानी का यही एक उदाहरण नहीं है। हमने बहुत जतन किये जवानी को बरकरार रखने के लिये।सड़क पर किसी का एक्सीडेंट हो, हम जाम लगायेंगे। देश में किसी की सरकार बने या जाये, हम जाम लगायेंगे। महंगाई बढ़े तो भी जाम लगायेंगे। जाम ही नहीं लगायेंगे बसों में आग लगायेंगे। ट्रेन में तोड़फोड़ करेंगे। सड़क तोड़ेंगे। लोगों के सर फोड़ेंगे। हमारा नारा है, हम अपनी आजादी को हरगिज भुला सकते नहीं, सर फोड़ सकते हैं लेकिन सर बचा सकते नहीं।
हमने आजादी के हर साल में आबादी को बढ़ाया। अगर स्वतंत्र नहीं होते तो आबादी कैसे बढ़ाते। किसी की मजाल जो हमसे कहे कि आबादी रोको। अरे ये तो सब भगवान की देन है। जितने बच्चे उतना आराम। कोई सड़क पर पालिश करेगा तो कोई जेब तराशेगा। अगर हमने आबादी नहीं बढ़ायी होती तो ये काम भला कौन करता। अरे हमें भी दूसरे देशों से पालिश, मालिश करने वाले बुलाने पड़ते। भला हो आजादी का।
आजादी है तभी तो हमारे वोट से जीतने वाले नोट के सौदे करते हैं। आजादी है तभी तो ठेके देने के सौदे होते हैं। जो जितने दाम देगा उतना नाम कमायेगा। आजादी न होती तो हर साल सड़क कैसे टूटती। हर नौ-दस साल में पुल कैसे धराशाई होते। सड़क नहीं टूटती, पुल धराशाई नहीं होते तो बेरोजगारी बढ़ जाती। कितनाबढ़िया इंतजाम है, हर साल सड़क बनाओं और बेरोजगारी मिटाओ। देश में पैसे की अगर कोई कमी होती तो भला दजर्नों मल्टीनेशनल कम्पनी मालामाल कैसे होतीं। हमने कोका कोला, पेप्सी पी-पीकर ही कई देशों का भला कर दिया।
क्या जरूरत है हम गांधी, सुभाष, लाजपत राय, भगत सिहं को याद रखें। ये वेचारे खुद जिन्दा होते तो सभासद का चुनाव नहीं जीत पाते। पार्टी टिकट लेने के लिये भी जुगत लगानी पड़ती। देखना पड़ता कहां कास्ट वोट कितना है। आजादी को जवान बनाये रखना आसान काम थोड़े ही है। सुबह झंडा फहरा दिया अब शाम को छुट्टी एन्ज्वाय करो।
हैप्पी इन्डिपेंडेंस डे।
पंकुल