pankul

pankul

ये तो देखें

कुल पेज दृश्य

रविवार, 15 मार्च 2009

आओ, पार्टी-पार्टी खेलें

दोस्तों, फोकटियों का मेला शुरू हो गया। अब न रहेगी मंदी और न नजर आयेगी बेरोजगारी। रोजाना दारू पी जाएगी और धड़ल्ले से बेरोजगारी दूर की जाएगी। वो तो आयोग विलेन बन गया वर्ना भाई लोगों के पास बांटने के लिये बहुत धन है। अरे पांच साल तक कमीशन यूं ही थोड़े ही खाया जाता है। कमीशन का बड़ा हिस्सा तो चुनाव में ही खर्च हो जाता है। भाई लोगों के दो नम्बर के धन से अगर किसी की दो-चार दिन चांदी हो रही है तो उसमें टांग नहीं अड़ानी चाहिए।
खैर ये बात तो उनकी है जो फोकटिये हैं। अपुन के दास जी के पास आज कल बिल्कुल फुर्सत नहीं है। सुबह से रात और रात से सुबह हो रही है। किसी ने पहला मोर्चा बनाया तो किसी ने दूसरा। अब पता नहीं पहला कौन है और दूसरा कौन। पर तीसरा मोर्चा बिल्कुल स्पष्ट है। जो एक दूजे के नहीं वो तीसरे के हैं। कई ऐसे भी हैं जो चौथे-पांचवें और छठे मोर्चे के होंगे। दास जी ने भी 1001 (एक हजार एक) वां मोर्चा बनाया है। भैया चौंकिये मत, दास जी तो गुंजाइश से ही काम करते हैं। पहले सब लोग एक -एक सीट वाले मोर्चा बनायें। उसके बाद भी कुछ बचें तो दो -तीन सौ मोर्चे बना लें। हम तो शगुन से चलते हैं। 1000 पर एक। पहले के 1000 मोर्चे बनने की गुंजाइश आपको नहीं लगती लेकिन दास जी लगती है। अरे एक-एक सीट पर चुनाव लड़ने वाले मोर्चा बनायें तो 545 मोर्चे बन जाएंगे। इसमें भी 455 सीटों पर फ्रेंडली फाइट हो सकती है। जब साइकिल वाले और हाथ वाले साथ-साथ चलकर भी दूर-दूर हो सकते हैं तो एक सीट वाले फ्रेंडली क्यों नहीं हो सकते। लड़ेंगे साथ और प्यार करेंगे साथ। एक पुराना गाना याद आता है,
हम ही से मोहब्बत
हम ही से लड़ाई
अरे मार डाला
दुहाई-दुहाई।
तीसरे मोर्चे वालों की कहानी तो और भी हिट है। तुम अपने घर में चौका करके आओ, हम अपने घर से रोटी बनाकर लायेंगे। बाद में साथ-साथ बैठकर खायेंगे। रोटियां कम पड़ीं तो पहले या दूसरे के घर पर खा आयेंगे। जो जितनी रोटियां सेक कर लायेगा उसे ही ताज पहना देंगे।
छोड़ों,हमें इन लोगों से क्या लेना-देना। अपन दास जी के मोर्चे की बात करते हैं। यहां किसी तरह का कोई डिस्प्यूट नहीं है। प्रधानमंत्री पद के दावेदार दास जी हो गये। चुनाव लड़ने के लिये सभी सीटें खाली पड़ी हैं जो चाहे टिकट ले जाए। समझौते में दास जी को एक भी सीट नहीं चाहिये। दास जी को चुनाव थोड़े ही लड़ना है। एक और महत्वपूर्ण बात। जरूरी नहीं चुनाव से पहले मोर्चा बने। चुनाव के बाद जीतने वाले दास जी के मोर्चे में शामिल हो सकते हैं। उनके मोर्चे के दरवाजे सभी के लिये खुले हैं। यहां साम्प्रदायिक, कम्युनिस्ट, कांग्रेस, गैर कांग्रेसी, समाजवादी, गैर समाजवादी, हार्ड कोर, साफ्ट कोर किसी से परहेज नहीं है। दास जी को सिर्फ सरकार बनानी है। दास जी अगर चुनाव लड़े तो यह सारे काम कैसे करेंगे। चुनाव के बाद अगर छह महीने से ज्यादा सरकार चली तो देखेंगे कोई जुगाड़।
रही बात पार्टी के एजेंडे की। यह बाद में बना लिया जाएगा। पार्टी की रीति, नीति बनाने के लिये दास जी कमेटी का गठन कर रहे हैं। इन सभी कमेटियों के अध्यक्ष दास जी ही हैं। पार्टी की सदस्यता के सभी दरवाजे खुले हैं। मोटा चंदा देने वालों को प्राथमिकता दी जाएगी। खास बात ये है कि सिर्फ चंदे की मोटाई देखी जाएगी, कहां स आया यह बात गौण है। पार्टी के सदस्य आप भी बन सकते हैं। आप चाहें तो चुनाव लड़ें टिकट पार्टी कार्यालय से प्राप्त की जा सकती हैं।
पंकुल

सोमवार, 9 मार्च 2009

होली के रंग

होली का त्यौहार अन्य त्यौहारों से पूरी तरह अलग है। पूरे भारत में जैसे होली मनायी जाती है उससे अलग होती है बृज की होली। बृज में होली के अनेक रूप सामने आते हैं। बरसाना में राधा रानी और उनकी सहेलियों के स्वरूप में श्रीजी धाम वृंदावन की हुरियारिनें नंदगांव के हुरियारों को लाठियों से मारती हैं। कभी यह खेल दूसरे रूप में होता होगा अब परम्परा का निवर्हन बहुत ही खूबसूरती से किया जा रहा है। बरसाना के बाद नंदगांव की बारी आती है और यहां जाते हैं बरसाना के छोरे। जो बरसाना में हुआ वही यहां होता है। होली में रंग डालाना, गुलाल लगाना आम बात है। पर लाठियों से स्नेह जताना अनूठा। नंदगांव में जहां लठामार होली होती है वहीं गोकुल में छड़ीमार। मान्यता है कि गोकुल में श्रीकृष्ण बाल रूप में रहे थे। यहां गोपियां छड़ी मारकर होली खेलती हैं। मथुरा जिले की छाता तहसील में फालैन गांव आज भी जलते अंगारों पर पण्डा के चलने के का गवाह है। यह क्षेत्र भक्त प्रह्लाद का क्षेत्र कहलाता है और यहां पण्डा होलिका दहन के बाद अंगारों पर चलता है। दुलहड़ी वाले दिन संत अपनी तरह से होली मनायेंगे और आम लोग अनी तरह से।
भैये ये सारी होली तो देखना और खेलना पर मजा चखना हो तो दौज (इस साल 12 मार्च) को बलदेव चले जाना। भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई महाबलशाली दाऊ की धरती की होली भी बलशाली ही होती है। यहां महिलाएं युवकों के कपड़े फाड़ती हैं और फिर मिट्टी में लटेपकर उसी कोड़े से पिटाई लगाती हैं। कोड़े खाकर भी लोग मस्त घूमते हैं। बलदेव क्षेत्र में गांव-गांव में यह होली होती है। कहीं कीचड़ फेंकी जाती है तो कहीं मिट्टी। दरअसल मान्यता है कि एक राक्षसी थी डुंडा। उसने उत्पात मचा रखा था। शिव जी से उसने वरदान भी लिया था। बाद में शिवजी ने उसके वरदान का उपाय बताया कि जो भी होली के बाद होलिका की राख मलकर डुंडा के सामने जाएगा उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा।
होली रिश्तों को प्रगाढ़ बनाने का भी त्यौहार है। इस मौके पर मैंने एक कविता को दो अलग-अलग रूप में लिखने का प्रयास किया है।

होली

बिखरा न अबीर, गुलाल अभी
न किसी ने मारी पिचकारी
मैं कैसे मानूं साथी
आई होली आई।
चेहरे भी लगते जाने-पहचाने
होश अभी है बाकी
भीगा न तन तेरा
फिर कौन कहे होली आई।
खामोश हैं दिशाएं
चुप हैं हवाएं
दिखे तेरा उजला तन
ये कैसी होली आई।
इसी कविता का दूसरा रूप प्रस्तुत है।
हर दिशा कुछ बोल रही,
हर पेड़ की डाली झूम रही
हर तन में छायी है अजब सी मस्ती
लगता है गोरी होली आई।
मदहोश चाल
और उड़ता गुलाल
हर ओर नजर आये धमाल
अब लगा गोरी होली आई।
भीग रहा तेरा तन
पहचानों कैसे तेरी शक्ल
पचरंगी हुई तेरी चुनरिया
कौन कहे होली न आई।
पंकज कुलश्रेष्ठ
ये तो हो गयी बेकार की बात अब कुछ काम की बात हो जाए।
दोस्तों होली बड़ी मुश्किल से साल में एक बार आती है। अपन का बस चले तो साल में कम से कम पच्चीस तीस बार होली खेल ही लें। होली के बड़े फायदे हैं। खूब झिककर दारू पियो, भांग खाओ और जहां चाहो वहां लेट जाओ। बड़े-बूढ़े भी होली मानकर चुपचाप बैठे रहते हैं। अपने दास जी तो होली के बहाने न जाने क्या-क्या कर आते हैं। पूरे दिन घर नहीं आते और जब भौजी फुनवा मारती हैं तो चौंक पड़ते हैं अरे, साथ तुम नहीं हो। इतनी देर से मेरी गाड़ी पर कौन बैठा था। होली यूं तो प्यार मोहब्बत बढ़ाने का दिन है लेकिन आप दुश्मनी भी निकाल सकते हो। जिसे चाहो, उसे धुन आओ और कह दो भैये रंगा चेहरा पहचान नहीं पाया।
होली के बहाने आप लोगों के घर के सामान को भी स्वाहा करवा सकते हो। क्या जमाना था जब लोग घरों के दरवाजे तक उखाड़ ले जाते थे। होली को ट्रेनिंग प्वाइंट भी कहा जा सकता है। होली का काम चंदा वसूली से होता है और चंदा वसूली उम्र बढ़ने के साथ ही ज्यादा काम आने लगती है। कभी पार्टी के नाम पर चंदा तो कभी इलेक्शन के नाम पर चंदा। एक बार मांगना सीख गये तो जिन्दगी में कभी मात नहीं खाओगे।
पंकुल

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

बेतुकीः अगला आस्कर फिर ले आओ

भैये देश को पहली बार आस्कर मिला। ये मानो पहली बार इसकी पुरस्कार की जुगा़ड़ हुई। अपने आमिर भाई को पहले ही आस्कर मिल जाता पर उन्हें फिल्म बनाने का सलीका नहीं आया। अरे भाई अंग्रेजों के मात्र गेम में ही उन्हें गंवार हरा दें और वो तुम्हें आस्कर देंगे। लोग कह सकते हैं जिसने कभी मोहल्ला पुरस्कार भी नहीं देखा वह तो यही कहेगा। पर गुरू मुझे मालूम है आस्कर का यह रिकार्ड अपन तोड़ सकते हैं। एक फिलम बनाने की जरूरत है। अबकी फिलम बनानी होगी एक ही भूल। नाम कुछ और भी रखा जा सकता है पर कहानी होगी वर्तमान की और फ्लैश बैक में चलेगा 1947 से पहले का किस्सा। कहानी का उद्देश्य होगा अगर हम आजाद न होते तो देश कैसा होता। यहां स्लमडाग नजर नहीं आते। हर शहर में खूबसूरत इमारतें होती और देश में गरीबी कहीं नजर नहीं आती। फिर फ्लैश बैक शुरू होगा। ब्रिटिश अधिकारी आ रहे हैं और भारतीयों को काम करने का तरीका बता रहे हैं। जिसने काम नहीं किया उसको कोड़ा मारा। दिखाया जाएगा किस तरह से आतंकवादी बेचारे अंग्रेजों को परेशान कर रहे हैं। फिर अंग्रेजों को विकास का मसीहा बताया जाएगा।
फिलम के आखिर में कहा जाएगा अगर भारत आजाद न होता तो विश्व में उसकी जगह कहीं और होती। भारत विकासशील नहीं विकसित देश होता। फिलम में एक-दो गाने भी होंगे। जब ब्रिटिश अधिकारी भारत आ रहे हैं तो एक अच्छा गाना फिट हो सकता है। गाने के बोल नहीं लिख रहा हूं विवाद की वजह से पर कुछ उसका मकसद होगा, हे महानुभाव, आप आओ। आप हमारे भाग्य के विधाता हो। हम लोग आपको चरणों में अपना सर रखते हैं। एक गाना बाद में फिट हो सकता है जिसमें कहा जाएगा
अगर हम आजाद न होते तो अच्छा था
जमाने भर की खुशियां हमें मिल जाती
न कहीं गरीब नजर आते, न बेकार ही दिखते
विकास की नदियां कल-कल बहतीं।
अगर हम आजाद न होते तो अच्छा था।
गाने को आप लोग बढ़ाइये।
फिल्म की कहानी आपको पसंद आई कि नहीं। यह फिलम सच के बेहद करीब मानी जाएगी आस्कर में सब कुछ जीत लायेगी। आमिर भैया का भी सुझाव है, आस्कर जीतना है तो खुद को हारता हुआ दिखाओ। आखिर हम भारतीय हैं, दूसरों की जीत की खातिर हार भी सकते हैं। फिर अंग्रेज कहेंगे, जय हो, जय हो, जय हो।
पंकुल

बेतुकीः अब दूल्हा पिटेगा

एक बहुत पुराना गाना है, देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान कितना बदल गया इंसान। गीतकार ने नाहक ही भगवान को परेशान कर डाला। अरे जमाना कोई बूंदी का लड्डू थोड़े ही जो हमेशा एक जैसा नजर आयेगा। अरे पहले के लोगों ने जो नहीं किया वह हम भी नहीं करें। यह तो कोई तुक की बात नहीं। भैया पहले लोग लंगोट पहनते थे अब क्या पहनते हैं यह अंदर की बात है। पहले लोग खेत में लोटा लेकर जाते थे अब कमरे (अटैच लैट) में ही हल्के हो जाते हैं। भैया सबको बदलना पड़ता है।
पहले बेगानी शादी के दीवाने अब्दुल्लाओं की कोई कमी नहीं थी। किसी की शादी हो उन्हें घोड़े के सामने नाचना। जिसे देखो वह आज मेरे यार की शादी ठुमकने लगता, आज मेरे यार की शादी है, यार की शादी है मेरे दिलदार की शादी है। ऐसा लगता है जैसे सारे संसार की शादी है। भैया तमाम लोग यार की शादी में नाचने के लिये खुद कुंवारे ही रह गये। कोई नाचता, मेरा यार बना है दूल्हा और फूल खिले हैं दिलके, मेरी भी शादी हो जाए दुआ करो सब मिलके। भैया नाचता ही रह जइयो, कोई तेरी शादी की दुआ नहीं कर रहा।
भैये, ये नया जमाना है। यहां अकल से काम लेना पड़ता है। तभी तो सारे के सारे बाराती दूल्हे से ही पूछ रहे हैं,तैनो घोड़ी किसने चढ़ाया भूतनी के। तैनो दूल्हा किसने बनाया भूतनी के। नाचते-नाचते भाई मेरे खुद ही दूल्हे को मारने का प्लान बना लेते हैं। बारात में तो कोई बात नहीं, घर की बात है। भैये, लड़की के दरवाजे पर डीजे तोड़ डांस करते हैं और दूल्हे से ही पूछते हैं भैया कल तक तू नंगा था, ये सूट-बूट क्या किराये पर ले आया। दूल्हा बेचार खींसे निपोरते हुए सब कुछ सह लेता है। कभी-कभी ऐसा लगता है कोई डीजे से कूद कर सीधे स्टेज पर न पहुंच जाए और दूल्हे का सूट ही खींच ले।
भैये दूल्हे की धुलाई करते हैं और जमकर खा-पीकर चले जाते हैं। बताओ जमाना बदला कि नहीं। अरे दुल्हन एक लाये और बाकी उसे यार बतायें कहां का इंसाफ था। अब कम से कम अपने मन की भड़ास तो निकला ही लेते हैं। एक और गाना कभी अपने सांसद राजबब्बर ने गाया था, दूल्हा बिकता है बोलो खरीदोगे। अब कोई गायेगा, दूल्हा पिटता है वोलो पीटोगे।
पंकुल

शनिवार, 31 जनवरी 2009

बसन्त

सुन चांदनी
मेरे आंगन में
सांझ ढले रात में
छिपकर किरणों से रवि की
तू एक बार आना।
ओ बदरिया
मेरी राह में
सूरज की आड़ में
मोरों की झनकार लिए
तुम मिल जाना।
ऐ हवा
मेरे गांव की चौपाल पर
फागुन की रात में
महक लिये साथ में
तू चली आना।
अरे बसन्त
चांदनी रात में
बदरिया की छांव में
बगियन की खुशबू लिये
मेरा मन आंगन महका जाना।
अरे बसन्त, ऐ बसन्त तू ही आना
हां तू ही आना।।
पंकज कुलश्रेष्ठ

मंगलवार, 16 दिसंबर 2008

मैं कुत्ताः चमचागीरी कोई हमसे सीखे




यह बहुत पेचीदा प्रश्न हो सकता है कि इंसान प्राचीन चमचा है या कुत्ता। इस प्रश्न का हल भी मुर्गी पहले पैदा हुई या अंडा सरीखा है। हम तो इतना जानते हैं पीढ़ियों से चमचागीरी करते-करते हम कुत्ते परिपक्व हो गये हैं। इसी चमचागीरी का नतीजा है हम शताब्दियों से इन्सान के साथ हैं।
चमचागीरी के कई नुस्खे हैं। सबसे पहले मालिक के आस-पास रहने की कोशिश करो। अगर मालिक के पास दो-तीन कुत्ते (चमचे) हैं तो वहां कम्पटीशन बढ़ जाता है। सुबह उठते ही मालिक के चरणों में लोट लगा दो। मालिक अगर हाथ इधर-उधर उठाये तो उसी दिशा में देखकर भौंकने लगो। अपने साथी कुत्ते को मालिक के आस-पास आने भी मत दो। जब खाना दिया जाए तो कोशिश करो मालिक की आंख के सामने न खाओ। कम से कम मालिक जब तक खाना न खाये, रोटी को मुंह तक न लगाओ। हां, अगर मालिक रोटी का टुकड़ा आपकी ओर फेंक दे तो उसे एक कोने में ले जाकर ऐसे खाओ जैसे बहुत बड़ा उपहार मिल गया हो। दरवाजे पर किसी अपरिचित के आते ही भौंकने लगो। जब मालिक डांट दे तो पूंछ हिलाते हुए उसके पास आ जाओ।
कुत्तों के चमचागीरी के यह गुण बिल्कुल इंसान सरीखे हैं। जिन लोगों को चमचागीरी का शौक होता है वह अपने मालिक (नेता, अफसर) के सामने जाते ही दण्डवत हो जाते हैं। अक्सर बड़े नेताओं और लोगों के एक से ज्यादा चमचे होते हैं। यहां वही चमचा सफल है जो सुबह मालिक के सोकर उठने से पहले ही दरवाजे पर जाकर खड़ा हो जाता है। दरवाजा खुला नहीं कि मालिक को प्रणाम किया। मालिकिन से सामान की लिस्ट ली और मालिक के पांव दबाये। घर में खींसे निपोरते-निपोरते बैठे रहें लेकिन खाना नहीं खायें। मालिक जो बात कहे उसकी हां में हां मिलाये। अगर मालिक कहे, मैं कल चांद पर जाऊंगा तो पहले ही कह दें, अरे आप तो जाने कब के चांद पर हो आते। आपने ही पहले दूसरों को मौका दिया। मालिक कहे मैं महान तो कहो अरे आप से बढ़कर कोई महान हो ही नहीं सकता। जब मालिक कहीं किसी जुगाड़ का काम करा दे तो कहो, आपने तो मेरी सात पुस्तैं सुधार दीं। मालिक कहे, भौंको तो काटने को दौड़ पड़ो। मालिक ने डांटा तो चुपचाप दुम हिलाते रहो।
ऐसे चमचों के सामने अक्सर दिक्कत नहीं आतीं। चमचे वाकई प्रेरणा के स्रोत हैं। चमचों से धैर्य रखने की प्रेरणा प्राप्त होती है। जब मालिक का खानदान सुविधायें पा लेगा तो चमचों को उसका लाभ मिलेगा। दिक्कत सबसे ज्यादा मोहल्ला चमचों के सामने आती है। हम कुत्ते तो अक्सर इस दिक्कत को झेल जाते हैं। एक मोहल्ले में रहते-रहते हम पालतू न होते हुए भी पालतू सरीखे हो जाते हैं। जिसके घर में गये वहीं रोटी का टुकड़ा मिल गया। दिन भर मजे से पेट भर जाता है। शाम को सभी के घरों के बाहर भौंक आये और अपना काम पूरा।
इंसानी मोहल्ला चमचों के आगे बहुत दिक्कत आती हैं। एक घर से निकलकर दूसरे घर में गये तो पड़ोसी के यहां नम्बर कट। एक मालिकिन का काम किया तो दूसरी का मुहं फूल जाएगा। इसके बाद भी तमाम मोहल्ला चमचे सफल हैं। सफल ही नहीं पूरी तरह हिट हैं। ऐसे महान चमचे हमेशा आदरणीय होते हैं। यही वो चमचे होते हैं जो भविष्य में प्रगति करते हैं। रिस्क लेकर आगे बढ़ते हैं। पहले मालिक के यहां जी हजूरी करते हैं फिर मालिक से बराबरी करने लगते हैं। ऐसे ही महान चमचे अपने भी चमचे पालते हैं। यही इनकी सफलता का राज है। ऊपर से चमचागीरी का मौका मिला और नीचे अपने चमचों को लगा दिया काम पर। ये महान चमचे मालिक के सामने पेट पर हाथ रखकर ऐसे बैठते हैं जैसे महीनों से रोटी नसीब न हुई हो पर ऐसा होता नहीं। यह सिर्फ भूखे रहने का स्टाइल मारते हैं। इसी लिये कहा जाता है हर सफल मालिक कभी न कभी मोहल्ला चमचा रहा होता है।
हम कुत्तों के लिये ऐसे मोहल्ला चमचे सदैव भगवान स्वरूप रहेंगे। यह वो कठिन काम है जो हम कुत्ते भी नहीं कर सकते। हमारे यहां जो मोहल्ला कुत्ते हैं उन्हें सिर्फ रोटियां मिलती हैं और इंसानी मोहल्ला चमचों को दूध मलाई और बोटियां खाने को मिलती हैं। बोटियां भी इतनी कि खुद खायें और अपने चमचों को बांट दें।
पंकुल

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2008

नित्य- निरंतर

मानवीय सोच और संवेदनाओं को समर्पित दो लघु कविताएं लिख रहा हूं। लिखने के लिये बार-बार निरंतरता बनाने का प्रयास करता हूं लेकिन हर बार कोई न कोई कारण गैप बना देता है।
यों ही

मानव क्यों उठा रहा अपनी अर्थी
स्व कंधों पर।
इस शहर से उस शहर तक
अन्जाने खामोश पथ पर
कब तक फिरेगा
यों ही बेसहारा।
तेरे अपने इस जीवन पर
हक है तेरा पूरा फिर भी
क्यों उठा रहा अपनी अर्थी।
जीवन के कुछ मूल्य
वो समय बहुमूल्य
जो तूने खोया
यों ही बेकाम।
ठहर कुछ पा सकता है अब भी
सोच क्या बन गया है मानव
क्यों उठा रहा अपनी अर्थी,
स्व कंधों पर।।


नित्य- निरंतर


यह मेरे स्वप्न
मेरी धरोहर
इनका टूटना-जुड़ना
नित्य-निरंतर
एक विडम्बना है।
कल्पना के आधार पर
विचारों का किला
सदैव हर आहट पर
भरभराकर गिरा
इसका बनकर बिखरना
नित्य-निरंतर
एक विडम्बना है।
आसमां के पंक्षी की तरह
दूर कहीं उड़ चला
पर पलक खुलते ही
जमीन पर आ गिरा
इसका उड़कर गिरना
नित्य-निरंतर
एक विडम्बना है।
पंकुल

मंगलवार, 25 नवंबर 2008

खंडहर

बहुत दिनों से विवाह समारोहों में व्यस्तता के चलते कुछ लिख नहीं सका। या यों कहें, शादियों में कारगिल सा युद्ध लड़कर ही लुत्फ उठा रहा था। विवाह समारोह भी अब सामान्य नहीं रहे। रिश्तेदारों को बुलाने से लेकर उनको खिलाने तक में बहुत कुछ बदल गया है। एक देहाती शादी में जाने का अवसर मिला जहां पर पत्तल की दावत के लिये कुछ मिनट इंतजार के बाद ही नम्बर आ गया। जिसने शादी में बुलाया था वह हर दो-तीन मिनट बाद ही आकर पूछ जाता एक पूड़ी तो और ले लो। कोई आकर कहता अरे बिल्कुल अभी-अभी कढ़ाई से निकालकर लाया हूं। खाने में व्यंजन कम और प्यार ज्यादा नजर आया। उसके ठीक दूसरे दिन शहर के एक प्रतिष्ठित व्यवसायी के यहां जाने का सौभाग्य हुआ। दरवाजे पर ही मेजबान के दशर्न हुए फिर हम अंदर थे एक समुंदर की तरह लोग आते जा रहे थे। किसको क्या मिला क्या नहीं इस बात से किसी को मतलब नहीं। कौन भूखा गया यह देखने की फुर्सत किसी को नहीं। अधिकांश लोग तो दस-बारह कार्ड गाड़ी में रखकर लाये थे। हर जगह फेरी लगा-लगाकर ही पेट भर गया। लेकिन उन बेचारों का क्या जो सिर्फ एक ही शादी में पेट भरने की जुगाड़ से गये थे। खैर ये तो व्यवस्था का सवाल है। आजकल इन प्रतिष्ठित शादियों में जाने वाले ऐसे लोग ज्यादा होते हैं जिन्हें कई जगह जाना होता है। इस खाने-पीने के बीच एक कविता लिखने का मन कर आया। डरिये नहीं, कविता का खाने पीने से कोई मतलब नहीं है।
खंडहर
वो
निर्जीव खंडहर
जो सहता है प्रकृति का हर बार
अपनी टूटी जर्जर दीवारों के सहारे
जिसके आगोश में दफन है
न जाने कितने युगों का इतिहास
जिसने सहा है
सैकड़ों दुशमनों का प्रहार।
पर यह निर्जीव खंडहर
जस का तस खड़ा रहा
हर युग में
समय का सबसे बड़ा राजदार
मौन हो देखता रहा
दिन- रात का बदलना
मानव का मानव से लड़ना।
यही निर्जीव खंडहर
जैसे अट्ठाहस लगा रहा हो
हमारी मजबूरी पर
और कह रहा हो
कितना मूर्ख है मनुष्य
जो मेरी चाहत में ही मर मिटा।
कभी लगता घूरता मुझे
ये निर्जीव खंडहर।।
पंकज कुलश्रेष्ठ

बुधवार, 5 नवंबर 2008

अपना-अपना कारगिल

दोस्तों बहुत ही विषम परिस्थिति सामने आने वाली है। आओ हम सब मिलकर युद्ध की तैयारी में लग जाएं। जब युद्ध करना ही है तो पहले उसकी ड्रेस का निर्धारण कर लें। सामान्य तौर पर इस युद्ध के लिये लोग सूट का इस्तेमाल करते हैं। जरूरी है कि अपनी-अपनी शादी के सिलाये सूट निकालकर उनपर स्त्री-सिस्त्री करवा लें। एक अदद जूते भी खरीद लें। ठोस और जमाऊ एड़ी वाले जूते को प्राथमिकता दें। अगर सूट नहीं है तो ठीक-ठाक सी जैकेट से भी काम चल सकता है। युद्ध का बिगुल नौ तारीख को बजने जा रहा है। आपको कब इस युद्ध में जाना है इसके लिये घर में रखे कार्ड देख लें। नहीं समझे। अरे दद्दू। शादी में खाने जाओगे तो युद्ध तो करना ही होगा। तुम क्या सोच रहे थे बार्डर पर तुम्हें भेजने का रिस्क लूंगा? कतई नहीं। तुम जाकर कारगिल की लड़ाई लड़ोगे और गोल्ड पाओगे? अरे भाई बीबी को सभी स्टाल का नाश्ता चखा दिया तो समझ लेना वीरता पदक मिल गया।
ध्यान रहे, पुराने समय की कहावत को मत भूल जाना। जिसने की शरम उसके फूटे करम। शादी में चाहे लड़की वाले की ओर से जाओ चाहें लड़के वाले की ओर से अपना टारगेट मत भूल जाना। सबसे पहले खुद पानी की टिकिया की लाइन में लगना और भाभी जी को भल्ले के लिए खड़ा कर देना। लाइन में लगते समय कतई बच्चे और बूढ़े का लिहाज मत कर जाना। यूं खड़े हुए तो बर्तन खाली होने के बाद ही नम्बर आयेगा। अपने सूट की क्रीज की चिन्ता की तो समझ लेना गये काम से। पता नहीं कब कोई भाई, भाभी या माताजी पीछे से आपके सूट पर दही या सौंठ टपका दें।
अपने दास जी इस मामले में बहुत ही एक्सपीरेंस्ड हैं। बिल्कुल अमेरिका की तरह। कोई लाइन नहीं, सब जगह बीटो पावर का इस्तेमाल। भैये सबसे पहले टिकिया वाले के पास पीछे से जाते हैं और रौब से कहते हैं, छोटू मजे में है। कैसा चल रहा है। अब टिकिया वाले को छोटू कहो या बड़को सब चलता है। बेचारा खींसे निपोर देता है और दास जी अचक से दोना उठाकर बढ़ा देते हैं जरा चखइयो तो। कैसा पानी बनाया है तूने। दास जी अपने साथ एक-दो चमचे को ले लेते हैं। कभी भल्ले वाले से पूछते हैं कोई चीछ कम तो नहीं। भल्ले वाला दमक कर बोल देता है सब ठीक है बाऊजी। बस हो गया दासजी का काम। हाथ बढ़ा कर कह देते हैं जरा दिखइयो तो कैसा माल डाल रहा है तू। दास जी एक-एक करके सभी स्टाल का माल चख लेते हैं।
ये दास जी के एक्सपीरेंस का मामला है। आपको तो आमने-सामने का युद्ध ही करना है। कभी इसको झिड़का, अरे क्या तमीज नहीं है भाई। पैंट पर दही गेर दिया। इसी बीचे पीछे से कोई बच्चा निकला नहीं कि पूरी पैंट का कबाड़ा। ऐसे में बड़बड़ाने के अलावा क्या कर सकते हैं। पहले खाने को तो मिले। पिछली बार चचे शादी में गये तो भूखे ही आ गये। एक स्टाल पर गये तो वहां भाभी और चाची जी को ही आगे करते रहे। यूं ही पहले आप-पहले आप कहते-कहते शाम से रात हो गयी और प्लेट साफ की साफ ही रही। बाहर निकले तो लिफाफा थमा दिया लड़की के पिता के हाथ में। उन्होंने भी पूछ लिया, अरे भाई कुछ लिया कि नहीं। बिना लिये मत जाना। अब उन्हें कौन बताये, कुछ हो तो लें।
पिछली बार अपने एक दद्दू भी गाम से पहली बार शहर की शादी में आ गये। अंदर पहुंचे तो सबसे पहले छोरी के पिता को ढूंढने में लग गयी। लड़की के चाचा मिले तो नमस्ते कर दी। एक बार नमस्ते कर आये पर कोई असर नहीं। इसके बाद एक-एक करके दर्जन भर बार नमस्ते कर आये। बार-बार सोच रहे कोई खाने को पूछे। किसी ने उनसे खाने को नहीं पूछी। बेचारे सोच रहे थे कोई एक बार तो कह दे कुछ खा लो दद्दू।
इस युद्द में जो भी अपने दोनों हाथों में दोने लेकर निकलता है वह खुद को राणा प्रताप से कम नहीं समझता। बाहर सबसे पहले दोने बीबी को थमाता है फिर अपना कोट संभलता है। बड़ी मुश्किल से मिला। लो चुन्नू तुम भी चख लो। पता नहीं, अंकल ने कैसा इंतजाम कराया है।
नाश्ते के बाद चुन्नू के पापा खाने की ओर गये और प्लेट में एक-एक करके सब कुछ भर लाते हैं। यही खाने का दस्तूर है। बार-बार लाइन में कौन लगे। कभी-कभी तो ऐसा लगता है मटर पनीर में दही ज्यादा पड़ गया या रसगुल्ला थोड़ा चटपटा है। कभी दाल मीठी सी लगने लगती है तो कभी मिठाई नमकीन। जब लोग सब ओर से निपट लेते हैं फिर ध्यान आती है कि वो शादी में मेहमान है। अपनी घरवाली से कहते हैं सुनो, वो लिफाफा जरा दे आओ फिर चलें। ये युद्ध किसी कारगिल से कम नहीं है। फिर चलो। तैयार हो जाएं।
पंकुल

रविवार, 2 नवंबर 2008

मैं कुत्ता(4)ः तरक्की के लिये टांग खिंचाई जरूरी


ये बात मुझसे बेहतर कौन जानता है कि कुत्ता आखिर कुत्ता ही होता है। हम लोगों को कुत्ता इसीलिये कहा जाता है क्योंकि हमारी कोई औकात नहीं होती। हमारी औकात नहीं होती इसलिये हम दूसरों की औकात को परखने की कोशिश करते हैं। हमारा यही सगुण आज मानव जाति के उत्थान का कारण बनता जा रहा है। सही मायनों में हमने लोगों को दिशा और दशा दिखायी है। समाज के पथ प्रदर्शक हम ही हैं। हम लोगों को कुत्ता खिंचाई जिसे आपके यहां टांग खिंचाई भी कहते हैं का प्रचलन प्राचीन काल से है। इस प्रथा का अनुसरण करने से आप लोग तरक्की कर रहे हैं।
हमारे सामने से रात को कोई भी आदमी ऐसा नहीं निकलता जिसका हम पीछा न करते हों। पैदल से लेकर कार वाले तक का हम अपनी सीमा के बाहर तक पीछा करते हैं। कई बार लोग स्कूटर पर टांग ऊंची करके हमसे बचने का प्रयास करते हैं। बड़े-बड़े धुरंधर रास्ता बदलकर चुपचाप निकल जाते हैं। रात के अंधेरे में लोगों को पता ही नहीं चलता हम कहां से निकलकर उनका पीछा करने लगते हैं। हमारी शिकारी अदा के अच्छे-अच्छे कायल हैं। असली आनंद तो तभी आता है जब लोग मोटर साइकिल और स्कूटरों की स्पीड दुगनी कर देते हैं। तुम्हारी कसम कई लोगों को तो मैंने ही गाड़ी से लुढ़कते देखा है। गाड़ी रुकने के बाद हमारा कोई विवाद नहीं होता। हम यह पीछा सिर्फ इसलिये करते हैं जिससे लोगों को आपनी औकात का पता चल जाए। पीछा करने से हमें आत्मिक सुकून भी मिलता है। अब आप लोग भी इसका अनुसरण करने लगे हो यह अच्छी बात है। सरकारी ठेके से लेकर बड़े-बड़े कामों तक इसी विद्या से काम चल रहा है। नैनो में सपना लेकर आने वालों के लिये आपके दिल में भी हमारी तरह कोई मोह-ममता नहीं है। कोई धुरंधर आये पर टाटा करके जाना ही पड़ेगा। तमाम ऐसे लोग हैं जिनकी ओर से लोगों ने गुजरना ही बंद कर दिया है। आपको हमारी इस विद्या से आर्थिक संतुष्टि होती है। बड़े-बड़े फक्कड़ इस कुत्ता परेड के चक्कर में शानदार गाड़ियों में घूमने लगे। अब हम उनकी गाड़ी का पीछा कर रहे हैं और वो अपने से बड़ी गाड़ियों को खोज रहे हैं।
यह कुत्ता परेड डर पैदा करने के लिए की जाती है। कई बार जाड़ों में हम चुपचाप पेट में सिर छिपाये बैठे रहते हैं और उधर से गुजरने वाले बिना पीछा किये ही टांग उठा लेते हैं। ऐसा नहीं लोगों को यह भी मालूम है कि जो भौंकते हैं वो काटते नहीं फिर भी हमारा डर उन्हें डराता रहता है। आपके यहां भाई लोगों ने भी इसी थ्योरी पर काम करना शुरू कर दिया है। एक बार किसी को चौराहे पर दो थप्पड़ जड़े फिर वह हमेशा वह उन्हीं के नाम की माला जपने लगता है। कुछ कुत्ते रात को चुपचाप एक कोने में पड़े रहते हैं। ऐसे कुत्तों ने पूरे समाज की नाक कटवा दी है। कभी कोई गाड़ी वाला उनकी टांग पर पहिया चढ़ा जाए या कभी कोई बच्चा लात मार जाए वह सिर्फ कूं-कूं कर सकते हैं। ऐसे कुछ मनुष्य भी हैं लेकिन उन्हें कोई पूछ ही नहीं रहा।(क्रमश)
पंकुल

सोमवार, 27 अक्टूबर 2008

बेतुकीः मां लक्ष्मी का सालाना निरीक्षण आज

राम-राम सा। आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। यह पर्व आप सभी के लिये मंगलमय हो। अब कुछ बेतुकी हो जाए।
दास जी के पुत्र को एक्जाम में दीपावली का निबंध लिखने को दिया गया। बालक मन ने इतना अच्छा निबंध लिख दिया कि मास्टर जी प्रसन्न हो गये। बोले बेटा तुझे बी.एड., पीएचडी करने की कोई जरूरत नहीं। महान पिता की महान संतान, तुम तो लोगों को भाग्य विधाता बनोगे। निबंध इस प्रकार था।
दीपावली मैया लक्ष्मी को मनाने का त्यौहार है। मैया लक्ष्मी बहुत दयालु हैं, कृपालु हैं। वह साल में एक दिन वार्षिक निरीक्षण पर निकलती हैं। सालाना निरीक्षण के लिये उन्होंने अमावस की काली रात को चुना है। इस सालाना निरीक्षण के लिये लोग घरों की सफाई करते हैं। जो अमीर हैं वो हर साल हर कमरे में महंगा वाला डिस्टेंपर करवाते हैं और जो गरीब हैं वो चार साल की गारंटी वाला डिस्टेंपर करवाते हैं। उनसे भी ज्यादा गरीब चूने से काम चलाते हैं। गांवों में लोग गाय-भैंस की पॉटी से भी काम चला लेते हैं। इस प्रक्रिया को ठीक वैसे ही समझा जा सकता है जैसे कोई वरिष्ठ अधिकारी सरकारी दफ्तर में सालाना निरीक्षण पर जाता है। इसके लिये अधिकारी कार्यालय को साफ कराते हैं। कमीशन वाले ठेकेदार से आफिस की पुताई करवाते हैं।
रंगाई पुताई के बाद घर के बाहर खूब सारी लाइटें और झालर लगायी जाती हैं। जब से चाइना वालों को दीपावली के बारे में मालूम पड़ा है उन्होंने 25-30 रुपये की झालर बेचकर बड़ी-बड़ी कम्पनियों की बत्ती गुल कर दी है। ये झालर सामान्य तौर पर सीधे बिजली के खम्भे पर जम्पर डालकर लगायी जाती है। चोरी की बिजली से झालर जलाने का आनन्द ही कुछ और होता है। झालर लगाने के बाद रात को मैया का पूजन किया जाता है। हमारे देश में पुरानी कहावत है, पैसा ही पैसे को खींचता है। इसी लिये लोग मैया के सामने चांदी-सोने के सिक्के रखकर पूजा करते हैं।
दीपावली का महत्व अधिकारी और प्रभावशाली लोगों के लिये विशेष होता है। कई अधिकारी तो साल भर तक आने वाले गिफ्ट का इंतजार करते रहते हैं। जितना बड़ा अधिकारी उतने ज्यादा गिफ्ट। शहरों में अक्सर देखा गया है कि लोग अपने घर में मिठाई का डिब्बा भले ही न ले जाएं पर अधिकारी को खुश जरूर करते हैं। जिस अधिकारी से जैसा काम पड़ता है वैसे ही गिफ्ट उसे दिये जाते हैं। ठेकेदार अपने-अपने विभागों के अफसरों को खुश करने के लिये मिठाई और पटाखे ले जाते हैं। एक बार अफसर खुश तो साल पर बल्ले-बल्ले। इन लोगों को मानना है कि मां लक्ष्मी साल में एक ही दिन के भ्रमण पर निकलती हैं बाकी के 364 दिन तो वह उन्हीं के यहां रहेंगी।
मैया के आने के इंतजार में कुछ लोग अपने घरों के दरवाजे खुले छोड़ देते हैं। इन लोगों के घरों में चोरी हो जाती है तो भी यह समझते हैं कि मैया ने पुराना माल बाहर निकला दिया अब नया भिजवायेगी। यह त्यौहार उन लोगों के लिये बहुत ही बढ़िया है जो जुआ खेलते हैं। मैया ताश के पत्तों से होकर उनके घर का दरवाजा खटखटा देती है।
इस त्यौहार का लाभ उन लोगों को भी है जो किसी न किसी रूप में सरकारी हैं। यही कारण हैं कि अपनी दीपावली मनाने के लिये दूसरों का जेब तराशना जरूरी है। खर्चे बढ़ते हैं तो छापे भी मारने पढ़ते हैं। अफसर को भी घर पर मिठाई चाहिये। उस बेचारे को भी अपने बड़े संतुष्ट करने होते हैं। बिजली वाले चोरी रोकने के लिये बागते हैं। जहां चोरी न हो रही हो वहां जम्पर डालकर चोरी करवाते हैं फिर खुद ही छापा मार देते हैं। इन्हीं लोगों ने कहावत बनायी है चोर से कह चोरी कर और सिपाही से कहो जागते रहे। अक्लमंद लोग साल में एक बार ही इतने गिफ्ट ले लेते हैं कि बाद में जरूरत ही न पड़े क्योंकि दीपावली गिफ्ट भ्रष्टाचार नहीं होता। यह तो सदाचार होता है।पूजा करने के बाद लोग अपने पैसे में खुद आग लगाते हैं और तालियां बजाते हैं। यह काम कालीदास जी से प्रेरणा लेकर किया जाता है। कालीदास जी जिस डाली पर बैठते थे उसी को काटते थे। इस दिन गणेश भगवान की भी पूजा होती है। लोग गणेश जी से कहते हैं कि वह अपने चूहे को समझायें कि वह दूसरे घरों से लक्ष्मी मैया को लेकर आयें।
उपसंहार
इस तरह से साफ है कि दीपावली सभी को खुश करने का दिन होता है। बड़ी-बड़ी कम्पनियां भी अपनी दीपावली मनाने के लिये गिफ्ट पैक भी बाजार में लाती हैं।
पंकुल

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2008

अप्रेरक प्रसंगः दास न रहे उदास

भ्रष्टाचार की मूर्ति दास जी नित्यकर्म के बाद जैसे ही चिलमन से बाहर आये चमचे दहाड़ मारते उनकी तरफ दौड़ पड़े। दास जी ने तनिक प्यार से पूछा, भैये चमचों क्या परेशानी है। दो-तीन-चार नम्बर के काम के धनी चमचे ने मुंह खोला, महाराज महंगाई मार रही है। दास जी ने चुटकी ली, काहे, दीवाली की मिठाई नहीं देने का इरादा है। कहां महंगाई है। सुबह से कुल्ला तक नहीं किया हूं और दो दर्जन से ज्यादा भक्त मिठाई दे गये हैं। एक-एक भक्त ने कितना खर्च किया मालूम है, कम से कम पच्चीस-तीस हजार। अरे भाई कोई हमारे लिए कपड़े लाया तो कोई अपनी चाची को खुश कर गया। तुम इतना महंगाई-महंगाई गिड़गिड़ा रहे हो, अभी चार ठौ ठेके नहीं दिलाये तुम्हें। घर में पैसा नहीं तो ठेके वापस कर दो।
लगता है तुम विपक्ष से जा मिले हो। कोई काम-बाम नहीं अफवाहें फैला रहे हो।
एक दूसरे चमचे ने हिम्मत जुटाई। बोला महाराज आपके लिए महंगाई नहीं है लेकिन अफसरों को भी हमई से दीवाली शुभ करनी है। ठेके मिलने के बाद सामान महंगा हो गया। रेत में रेत मिलाने की भी गुंजाइश नहीं बची है। सीमेंट का कट्टा दिखा कर काम चल रहा है। दास जी ने कहा, चमचे इसमें परेशान होने की कोई बात नहीं है। सरकार किसकी, हमारी। जांच कौन करेगा हम। किसने कहा तुमसे काम करो। ठेका लो और कमीशन भेंट करो। तुम्हारी दीवाली में रौनक रहे और हमारे बच्चे टापते रहें, यह नाही होगा ना।
दास जी ने मुस्कराते हुए समाधान बताना शुरू किया तो चमचे उनके चारों ओर चुपचाप बैठ गये। दास ने भ्रष्ट वचन देना शुरू किया तो सन्नाटा पसर गया। दास जी ने गंभीर मुद्रा में कहा जिस तरह सूरज पूरब से निकलता है यह सत्य है उसी तरह तुम हमारी दीवाली मनवाओगे यह सत्य है। महंगाई बढ़ी कोई बात नहीं, सामान और कम डालो। और मुसीबत आये तो काम ही मत करो। हम हैं न झेलने को। तुम तो बस नोट छापो और हमें दो।
दीवाली साल में एक बार इसलिये आती है जिससे लोग अपने सुख (गिफ्ट) दूसरों को बांट सकें। मिठाई के नाम पर लीगल रिश्वत ले सकें। भगवान ने हमें सरकारी बनाया है। जो सरकारी होता है उसकी दीपावली तुम जैसे चमचे ही मनवाते हैं। भविष्य में ध्यान रखना हर अधिकारी को उसकी औकात के हिसाब से संतृप्त जरूर करना। तुम जैसे चमचों का जन्म ही हम जैसे लोगों के लिये हुआ है। यह कहकर दास जी कमरे में प्रवेश कर गये और चमचे उनकी दीपावली की तैयारी की वाह-वाह करते हुए उठ कर चले गये।
पंकुल

बुधवार, 22 अक्टूबर 2008

लगे रहो राज भाई

राज भाई, यों ही लगे रहना। किसी से डरने की जरूरत नहीं। आखिर किसकी मजाल जो तुम्हारी बिना बाल की मूंछ टेड़ी कर सके। राजेश खन्ना का गाना नहीं सुना, कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना। छोड़ो बेकार की बातों में, बीत न जाए रैना। तुम तो पुरानी कहावत के सहारे ही जीना। यानि सुनो सबकी और करो मनकी। अरे भाया तुम्हें कौन महाराष्ट्र के बाहर राजनीति करनी है। जितनी सीटें मिलेंगी, महाराष्ट्र में ही मिलेंगी। कुछ नहीं तो कम से कम दस-पांच हजार वोट तो बढ़ेंगे ही। ये चिन्ता उन्हें करने दो जो राष्ट्रीय दुकान चला रहे हैं। तुम्हारी ठेठ महाराष्ट्री दुकान है वही माल बेचो जो बिके। अब गंजों के शहर में कोई कंघे तो बेचेगा नहीं।
राज भाई, अभी तक तो बाहर के आदमियों को मार-मार कर निकाला है। अब सबसे पहले बाहर की भैंसों को लात मारकर निकाल देना। सभी भैंसों का डीएनए टेस्ट करा लेना। किसी के दादा-परदादा भी यूपी., बिहार के निकल आयें तो डंडे सहित बाहर का रास्ता दिखा देना। अपने ब्लड का भी एक बार टेस्ट तो करा ही डालना। पता नहीं कब रेस्ट आफ इंडिया की गाय-भैंस का दूध पी लिया हो। जाने-अनजाने किसी टाफी, चाकलेट में ही बाहर का दूध अंदर चला गया हो। बड़ी दिक्कत हो जाएगी। एक काम और जरूर करना, जितनी भी परचून की दुकान हैं उनमें रके सामान को भी चेक कर लेना। बाहर का बना हो तो आग लगा डालना। अरे कम से कम यूपी और बिहार की दाल, आटा, चावल, मेवा, मिश्री मत खाना। भैया कन्हैया जी को भी मत याद करना, वह भी बेचारे यूपी के ही थे।
अपने घर की छत, दीवार और ईंटों को खुदवाकर एक बार जरूर देख लेना। कहीं उसमें यूपी, बिहारी या बिलासपुरी मजदूर के पसीने की दुर्गन्ध तो नहीं आ रही। अपने चेलों का भी डीएनए जरूर करा लेना, कहीं उनके मां-बाप तो उत्तर प्रदेश, बिहार के नहीं थे। तुम्हें कमस है पूरे महाराष्ट्र में बाहर की कोई निशानी मत छोड़ना। कभी उस ट्रेन में मत बैठना जो इधर से होकर जाती हो। इतना तो देख ही लेना, कहीं उसका ड्राइवर तो बिहारी नहीं है। प्लेन में बैठो तो आस-पास बिहारी को देखते ही ऊपर से कूद जाना। अबकी जब क्रिकेट टीम का कोई खिलाड़ी रन बनाये तो ताली बजाने से पहले उसका प्रदेश जरूर पता कर लेना। तुम्हें कसम है, राज भाई। भूल से अगर इधर की मिट्टी भी मिल जाए तो उसे इधर ही भिजवा देना। कोई बात नहीं, अगर कुछ दिन जेल में भी रहना पड़े तो कोई बात नहीं, ये सब लोग तो तुम्हारी तरक्की से जलने वाले हैं। बेस्ट आफ लक। जिन्दगी भर एक दड़बे में ही रहना।
पंकुल

सोमवार, 20 अक्टूबर 2008

अप्रेरक प्रसंगः दोस्त वही जो प्रभावशाली

एक समय की बात है, दास जी अपने सरकारी बंगले के गार्डन में ध्यानस्थ बैठे थे। चारों ओर शांत मुद्रा में चमचे उनके इस रूप को देखकर गार्डन-गार्डन हो रहे थे। चारों ओर चमचों की बढ़ती भीड़ देख दास जी ने आंख खोल दीं। प्रसन्न मुद्रा में बोले, चमचों आज क्या समाचार है। एक चमचा बोला महाराज दोस्त और दुश्मन में क्या फर्क है।
दास जी के माथे पर सिलवटें बढ़ गयीं। गहन विचार के बाद बोले चमचे तुम्हारा सवाल अति उत्तम है। पूर्व में महाभारत के समय भी इसी तरह के प्रश्न के चक्कर में अर्जुन परेशान थे। दास जी के मुख से निकलते शब्दों को सुन चमचे कुछ और नजदीक आ गये। दास जी ने कहा दुनिया में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता है। जिस हाथ से आप साइकिल को फेंक देते हैं वही हाथ साइकिल चलाता भी है। जिस हाथी से अच्छे-अच्छे डरते हैं वह भी दोस्त हो सकता है। राजेश खन्ना ने कहा था, मिथुन चक्रवर्ती ने कहा था। हाथी मेरा साथी। जब हाथी साथी हो सकता है तो दोस्त ही हुआ। ये अलग बात है जब हाथी को पानी पीना हो तो वह हैण्डपम्प से भी पी सकता है। जिस तालाब में कमल के फूल खिलते हैं उसका पानी खत्म भी कर सकता है। हाथी दयालु भी बहुत होता है। वह कभी कमल के राखी भी बांध देता है।
यही कारण है कि हाथी से तालाब में खिल रहे कमल डरते हैं। उन्हें हाथी की दुश्मनी से डर लगता है। डरता हाथ भी है। साइकिल हाथी से तेज नहीं चल सकती। साइकिल को भी हाथी से डर लगता है। इसलिए सब डरने वाले दोस्त होते हैं। साइकिल को हाथ का सहारा तो कमल को हैण्डपम्प का। हाथी जितना पानी पीयेगा उसका थोड़ा बहुत तो तालाब में हैण्डपम्प से भर ही जाएगा। साइकिल अगर गिरी तो हाथ का सहारा मिल ही जाएगा। लेकिन जब हाथी की सांस फूले, वह बीमार सा हो जाए। उसकी वोटें (सांसे) बंद होने लगें तो वह साइकिल की सवारी भी कर सकता है। हाथी को हाथ घास भी खिला देता है।
अचानक के चमचे के जेहन में सवाल कौंधा। महाराज जब सब घालमेल है तो सभी दोस्त क्यों नहीं हो जाते। दास जी वोले, बेटा जब सब बाहर वाले एक हो जाएंगे तो अंदर वाले बाहर जाने लगेंगे। यह तो अटल सत्य है। किसी का कल्याण जब साइकिल पर बैठकर नहीं होता तो वह कमल को देखकर ही आत्मविभोर हो जाता है। एक चमचे ने कहा, महाराज जब हाथी विशाल है तो उससे लोग लड़ते ही क्यों है। दास जी बोले, चमचे। यह दोस्ती और दुश्मनी तो असल में नजरों का फेर ही है। कब बाहर वाला अंदर दोस्ती निभाये यह पता ही नहीं चलता। ऐसे दोस्तों को छुपा रुस्तम कहते हैं। रुस्तम कब छिपकर विभीषण बन जाए पता ही नहीं चलता।
अंत में दास जी बोले, बेटा दोस्त उसको मानना जो प्रभावशाली हो। दुश्मन उसको मानना जो तुम्हारा कुछ बिगाड़ न सके। इस सूत्र पर चले तो बल्ले-बल्ले होगी, वरना...
दास जी के इस गूढ़ वाक्य को सुनकर चमचे वाह-वाह कर उठे।
पंकुल

शनिवार, 18 अक्टूबर 2008

मैं कुत्ता(3)- क्षेत्रवाद हमारी पहचान






दोस्तों बहुत दिनों के बाद मुलाकात हो रही है। हम कुत्तों की आदत ही कुछ ऐसी है कि जहां एक बार पंजों से मिट्टी उड़ाकर बैठे तो झपकी लग ही जाती है। खैर बात हो रही थी हमारी कुत्तानीयत की। अरे जब इंसानों की नीयत को इंसानीयत कहते हैं तो कुत्तों की नीयत को और क्या कहेंगे। हम कुत्ते सदा से क्षेत्रवादी रहे हैं। इसे दूसरी तरह ऐसे भी समझा जा सकता है कि हम कुत्ते विस्तारवादी नहीं होते। एक मोहल्ले से निकलकर हम ज्यादा इधर-उधर भागते ही नहीं है। जब जाते भी हैं तो दूसरे कुत्ते टांग खिंचाई कर देते हैं।


इंसानों में यह सगुण हम से ही ट्रांसफर हुआ। हर कोई अपने ही मोहल्ले में घूमता है। जिस इंसान को जिस विभाग में ठेके लेने होते हैं वह उन्हीं अधिकारियों के आगे पूंछ हिलाता है। जब ठेके लेने के लिये दूरे विभाग में जाता है तो वहां उसकी कुत्ता खिंचाई होती है। मोहल्ले के कुर्ताधारी अपने क्षेत्र में ही भाषण देते हैं,दूसरे क्षेत्र में जाने की हिम्मत कुछ बिरले ही करते हैं। आप लोगों को इस काम में दूसरे कुत्ते सारी इंसानों का सहयोग मिल जाता है। इस मामले में यहां कुत्तानीयत हमारे यहां विशुद्ध है। हमने तो सुना है आप लोगों ने अपनी-अपनी पार्टियों के भी मोहल्ले बना लिये हैं। चलो अच्छा ही है। हमारी व्यवस्था विशेष है और इस व्यवस्था में बुरा मानने वाली कोई बात भी नहीं है। हम अगर इस व्यवस्था, इस अनुशासन को नहीं मानेंगे तो आपकी तरह अव्यवस्था फैल जाएगी। आप लोग तो जहां मन हुआ वहां मोहल्ला नीति का पालन करते हो और जब अपना फायदा हुआ तो तुरंत राष्ट्रव्यापी हो जाते हो। हमारी व्यवस्था से खाने का संकट कभी नहीं आता। हमारे मोहल्ले के लोग जानते हैं किस-किस कुत्ते को खाना देना है। सुरक्षा का संकट भी नहीं आता। कोई हमारे बहन-बेटी की अस्मत पर हमसे बिना पूछे हाथ भी नहीं डाल सकता। पर आप तो जानते ही हो, आखिर हम कुत्ते ही जो ठहरे। कभी-कभी प्रेमालाप के लिये दो मोहल्लों की सीमा तोड़ दी जाती है। यह तो वैसे ही समझो जैसे मैत्री बैठक हो रही हो। हकीकत ये है कि असल कुत्ता हमेशा क्षेत्रवादी होगा। हमें अपने इस क्षेत्रवादी या यूं कहें मोहल्लावादी होने पर हमेशा गर्व है। हमारे यहां मोहल्लावाद इतना शक्तिशाली है कि जातिवाद आता ही नहीं। हम तो ऐसे जानते हैं जैसे टामी नुक्कड़ वाला, कालू हलवाई वाला, राज्जा दारू वाला, भूरा अंडेवाला...। इसमें कोई कोटा भी फिक्स नहीं है। इतना तय है कि भूरा के बच्चे अंडे की ठेल के आस-पास ही घूमेंगे और राज्जा के दारू वालों द्वारा छोड़े गये दोने ही चाटेंगे।
(more)

पंकुल

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2008

पुज गये महाशय

पुज गये महाशय। सौभाग्य की बात है हर विलुप्त प्राय वस्तु की तरह आपका का भी एक दिन आ ही जाता है। सुबह से इठलाने का आनंद ही कुछ निराला है। शाम हुई और भूखी-प्यासी पत्नी ने जब चंद्रमा को याद किया तो आप साक्षात सिर से पांव तक कांप गये होंगे। जब पत्नी ने आपके पांव छुये होंगे तो आपका रोम-रोम सिहर गया होगा। ऐसा ही होता है। जब अचानक खुशी किसी को मिले तो यह आभास स्वाभाविक है। महाशय, साल भर पर्यावरण दिवस, साक्षरता दिवस , हिन्दी दिवस और न जाने कितने-कितने दिवस मना डालते हैं तब कहीं जाकर यह अनुभूति देने वाला दिवस आता है। कहते हैं, घूरे के दिन भी फिरते हैं। सो अपने और आपके भी हर साल एक दिन ही सही फिर ही जाते हैं। शायद इसी दिन को देखकर किसी ने पति परमेश्वर की कहावत का ईजाद कर दी होगी।
कुछ भाभियों, आंटियों को दिक्कत होती है कि पति के पूजन का दिन तो भगवान ने बना दिया, पत्नी पूजन का क्यों नहीं। भैये उन आंटियों और भाभियों को मेरा नमन। पर कभी सुना है कि सांस लो दिवस मनाया जाए। कोई खाना खाओ दिवस या स्नान दिवस आदि भी कभी मनाता है। यह सारे कार्य नित्य हैं। बेतुकी महा ग्रंथ में भगवन दास जी ने स्पष्ट किया है कि जो चीज नित्य-निरंतर है उसका दिवस मनाने की कोई आवश्यकता नहीं है। जिसकी उपलब्धता खतरे में हो उसको याद रखने के लिये साल में एक दिन निर्धारित करना धर्म परक है।
वैसे महाशय, मेरा एक सुझाव है। पुजने की परम्परा तो ठीक पर ज्यादा कड़ाई से पेश मत आना। आप तो एक दिन के परमेश्वर ठहरे, 365 दिन का परमेश्वर भी ज्यादा कड़ाई नहीं बरतता। कहीं ऐसा न हो सौ सुनार की और एक लुहार की। आशय समझ ही लिया होगा। भविष्य में ध्यान रखिये और साल में एक दफा पुजते रहिये।
पंकुल

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2008

बेतुकीः फिर निपट लिये रावण जी

फिर निपट लिये रावण जी। आपके सालाना निपटान दिवस पर आपके पुतले खूब धू-धू कर जले। अरे आपको साक्षात निपटाने की तो किसी में हिम्मत है नहीं। आपके पुतले को जलते हुए देखकर ही अपन तो पुरुषार्थ दिखा देते हैं।
भाई दसानन किसी जमाने में आपके दस सिर हुआ करते थे। आपने एक ही भूल की और अपने पूरे खानदान को मरवा दिया। हो सकता है आपकी यह गलती इन दस सिरों की वजह से ही हो गयी हो। अब दस-बारह पार्टियों के नेता सरकार बनाने के बाद भी एक जैसा नहीं सोच सकते तो आपके दस सिर कैसे सोच सकते थे। आपके किसी एक सिर ने सोचा होगा और आपने किडनेपिंग की योजना बना डाली। दूसरे सिर को इतना मौका तो दिया होता कि वो भले-बुरे की सोचता।
लंकाधिपति, आप अपनी सरकार चलाने के लिए कैसे सोचते थे। कम से कम इतना तो कर ही सकते हो कि थोड़ा सा ये गुर भी नेताओं को दे दो। नेताओं को आपने किडनेपिंग का गुर तो सिखा दिया। सीता हरण की तरह महिलाओं के अपहरण में भी निपुण बना दिया। मैंने सुना है आपके दस सिरों में एक सिर विद्वान का था। लगता है राम का वाण लगते ही आपके विद्वान सिर मुक्ति मिल गयी। बाकी बचे नौ सिर हर बार छह नये रूप में पुनर्जन्म लेते रहे। तभी तो आज आपके नौ सिरों के करोड़ों रूप पैदा हो गये। आपने लंका में घर बनाया था। अब तो हर शहर, हर गली में आपके नौ सिरों के अवतार पैदा हो गये हैं। सड़क चलते कब कौन सा रावणावतार प्रकट हो जाए पता नहीं।
जैसे आप वेश बदलने में माहिर थे, वैसे ही आपके अवतार भी हैं। कभी वोट की भिक्षा लेने के लिए घर-घर चक्कर लगाते हैं तो कभी किसी और रूप में।
हे रावण। इतनी शिक्षायें आपने दीं तो कम से कम एक शिक्षा और दे देते। आज के मिलीजुली सरकार के युग में एक सिर ऐसा पैदा कर देते जो कम से कम ढंग से सरकार तो चला लेता। हम आपको हर साल मारते रहेंगे। हर साल गली-मोहल्ले में तुम्हारा जुलूस निकालते रहेंगे जब तक तुम पूरे न निपट लो या हमें न निपटा दो। आपको निपटाने के लिए अभी तो राम जी को भी आने की फुर्सत नहीं दिख रही। यह भी हो सकता है इतने सारे रावणों को निपटाने में अकेले श्रीराम को प्राबलम आ रही हो। खैर, जो भी हो, हम तो इंतजार ही करेंगे।
पंकुल

मृग मारीचिका

दुनियां के इस रेगिस्तान में
ये मेरे निसां
आंधी के इक झोंके में
मिट जाएंगे।
फिर रह जायेगी इक सूनी जमीं
और चतुर्दिशा में बढ़ता
अंजान लोगों का काफिला
जो छूना चाहता है
वह मृग मारीचिका
जिसकी तलाश में मैंने
उम्र तमाम की।
और न जाने कितने लोग
दफन हैं इस रेगिस्तान में।
पंकज कुलश्रेष्ठ

रविवार, 14 सितंबर 2008

बेतुकी - बहुत याद आती है तुम्हारी

कसम से, तुम्हारी बहुत याद आती है। बिल्कुल हर्ट से कह रहा हूं। यों भी कह सकता हूं, तुम्हारी याद में आंसू बहा रहा हूं। अपने प्रियजनों की तरह हर साल तुम्हारी याद करता हूं। दर्जन, दो दर्जन लोगों से तुम्हारी तारीफ भी करता हूं। पर मुकेश का एक गाना मेरे रग-रग में बसा हुया है। जो चला गया उसे भूल जा। मैंने इसी लिए तुम्हें हमेशा भूलने की कोशिश की। मैं जानता हूं जाने वाले कभी लौट कर नहीं आते। पर रस्मों-रिवाज भी टाले नहीं जा सकते हमने आज भी यही कहा, ओ जाने वाले हो सके तो लौट कर आना।
इन्हीं रस्मो-रिवाज के बीच जब हमें चार लोगों के बीच भषणियाना पड़ा तो बहुत डिफीकल्टी फील हुआ। पर हमने भी शुरूआत से ही जो कहा, सभी वैरी गुड-वैरी गुड कहते नजर आये। हमने शुरूआत की, आई लव हिन्दी। नेचुरियली हिन्दी, हिन्दुस्तान की लेंग्वेज है। हम सभी लोगों को हिन्दी को प्रमोट करना ही चाहिए। कम से कम एक दिन तो हम हिन्दी की याद में बिता ही सकते हैं। आई फील, हिन्दी में डेली काम करना परेशानी का सबब हो सकता है। आज हमें विश्व में तरक्की करनी है तो अंग्रेजी को भी उतना ही सम्मान देना होगा। बट, ऐसा नहीं कि अंग्रेजी बोलने से हिन्दी का अस्तित्व खत्म हो जाएगा।
इसी बीच वहां बैठे मेरे अजीज ने मेरा समर्थन किया। बोले, कम से कम अपने मजदूरों से बात करते वक्त तो हमें हिन्दी में ही बात करनी चाहिए। तभी एक भाई बोले,सर क्या बतायें, हिन्दी बहुत ही फनी लेंग्वेज है। मैंने तो अपने बच्चों को भी कहा है कि हिन्दी जरूर सीखें। मेरी बिटिया बता रही थी ट्रेन को लौह पथ गामिनी कहते हैं। मीटिंग में बैठे सभी दोस्त एक साथ बोले व्हाट फनी। आओ चलो अब मीटिंग को खत्म कर दिया जाए।
लास्ट में वी आल लव हिन्दी। जोर से कहो, वी आल लव हिन्दी।
थैन्क्यू।
और अंत में, मैं जब इंटर में पढ़ता था तो मेरे एक मित्र ने दो पंक्तियां सुनायी थीं। इन पंक्तियों के लेखक से अनुमति सहित यहां प्रस्तुत करना चाहूंगा
हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दीजैसे प्रश्नवाचक चिन्ह के नीचे लगी बिन्दी


पंकुल

शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

अप्रेरक प्रसंगः कपड़ों से फर्क पड़ता है

कुछ समय पहले ही बात है। दास जी अपने सरकारी बंगले के अंतःपुर में विश्राम कर रहे थे। आस-पास चमचों की चटर-पटर रोजाना की भांति ही माहौल को चमचामय बनाने में सफल हो रही थी। प्राचीन समय के इद्रलोक की भांति ही अप्सराएं भी वहां मौजूद थीं। सोमरस का पान करते हुए दास जी इस अति सम्मोहनशाली माहौल को देखकर मंद-मंद मुस्करा रहे थे।
इसी दौरान एक चमचे के मन में कोई शंका पैदा हुई। शंका हो और दासजी उसका समाधान न करें ये असंभव बात है। चमचे ने किंचिंत सोचनीय मुद्रा बनाते हुए प्रश्न किया दास जी आखिर सभी नेता सफेद कपड़े ही क्यों पहनते हैं। प्रश्न बहुत ही गंभीर। चारों ओर सन्नाटा सा पसर गया। सभी चमचे एकटक दास जी के मुंह की ओर टुकुर-टुकुर ताकने लगे। जैसे वहां से वेदवाक्य अब फूटे कि अब फूटे। दास जी की मुद्रा बिल्कुल ऐसे जैसे कभी सूत जी की हुआ करती थी। प्राचीन काल में लोग सूत जी से इसी तरह के प्रश्न किया करते थे।
कुछ क्षण सोचने की मुद्रा के बाद दास जी ने अपना मुंह खोला। बोले चमचे तुमने बहुत ही नेक प्रश्न दागा है। मैं इस प्रश्न का उत्तर जरूर दूंगा। सुनो सफेद कपड़े पहनने के तीन मुख्य कारण हैं।
(1) हमारे समाज में प्राचीन काल से ही कपड़ों के रंग और ढंग का विशेष महत्व रहा है। राजा-महाराजा भी समय और परिस्थितियों के अनुकूल ही वस्त्र धारण करते थे। जब कभी शोक का माहौल होता था सफेद वस्त्र पहने जाते थे। आज जनता गरीब है और हमें हर समय शोक के माहौल में डूबा रहने पड़ता है इसलिए सफेद वस्त्र पहने जाते हैं।
(2)सफेद वस्त्र शांति का प्रतीक है। हमें हमेशा शांत रहकर ही दूसरों के घर में अशांति फैलाना पड़ता है। इसलिए सफेद रंग से बेहतर दूसरा रंग नहीं होता।
(3) सफेद रंग पर कभी भी कोई भी रंग आसानी से चढ़ सकता है। हमारा कोई भरोसा नहीं, सुबह लाल रंग में बैठे हैं तो शाम को केसरिया ओढ़ लिया। कभी हरा रंग नजर आने लगता है तो कभी लाल-हरे-नीले से प्रेम हो जाता है। बालक यही कारण है जब चाहे जो रंग मिले, सफेद पर पर तुरंत चढ़ा लो।
चमचे ये जवाब सुनकर बेहद प्रसन्न हुए, और दास जी वहां से अंतर्ध्यान हो गये।
पंकुल