एक समय की बात है, दास जी अपने सरकारी बंगले के गार्डन में ध्यानस्थ बैठे थे। चारों ओर शांत मुद्रा में चमचे उनके इस रूप को देखकर गार्डन-गार्डन हो रहे थे। चारों ओर चमचों की बढ़ती भीड़ देख दास जी ने आंख खोल दीं। प्रसन्न मुद्रा में बोले, चमचों आज क्या समाचार है। एक चमचा बोला महाराज दोस्त और दुश्मन में क्या फर्क है।
दास जी के माथे पर सिलवटें बढ़ गयीं। गहन विचार के बाद बोले चमचे तुम्हारा सवाल अति उत्तम है। पूर्व में महाभारत के समय भी इसी तरह के प्रश्न के चक्कर में अर्जुन परेशान थे। दास जी के मुख से निकलते शब्दों को सुन चमचे कुछ और नजदीक आ गये। दास जी ने कहा दुनिया में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता है। जिस हाथ से आप साइकिल को फेंक देते हैं वही हाथ साइकिल चलाता भी है। जिस हाथी से अच्छे-अच्छे डरते हैं वह भी दोस्त हो सकता है। राजेश खन्ना ने कहा था, मिथुन चक्रवर्ती ने कहा था। हाथी मेरा साथी। जब हाथी साथी हो सकता है तो दोस्त ही हुआ। ये अलग बात है जब हाथी को पानी पीना हो तो वह हैण्डपम्प से भी पी सकता है। जिस तालाब में कमल के फूल खिलते हैं उसका पानी खत्म भी कर सकता है। हाथी दयालु भी बहुत होता है। वह कभी कमल के राखी भी बांध देता है।
यही कारण है कि हाथी से तालाब में खिल रहे कमल डरते हैं। उन्हें हाथी की दुश्मनी से डर लगता है। डरता हाथ भी है। साइकिल हाथी से तेज नहीं चल सकती। साइकिल को भी हाथी से डर लगता है। इसलिए सब डरने वाले दोस्त होते हैं। साइकिल को हाथ का सहारा तो कमल को हैण्डपम्प का। हाथी जितना पानी पीयेगा उसका थोड़ा बहुत तो तालाब में हैण्डपम्प से भर ही जाएगा। साइकिल अगर गिरी तो हाथ का सहारा मिल ही जाएगा। लेकिन जब हाथी की सांस फूले, वह बीमार सा हो जाए। उसकी वोटें (सांसे) बंद होने लगें तो वह साइकिल की सवारी भी कर सकता है। हाथी को हाथ घास भी खिला देता है।
अचानक के चमचे के जेहन में सवाल कौंधा। महाराज जब सब घालमेल है तो सभी दोस्त क्यों नहीं हो जाते। दास जी वोले, बेटा जब सब बाहर वाले एक हो जाएंगे तो अंदर वाले बाहर जाने लगेंगे। यह तो अटल सत्य है। किसी का कल्याण जब साइकिल पर बैठकर नहीं होता तो वह कमल को देखकर ही आत्मविभोर हो जाता है। एक चमचे ने कहा, महाराज जब हाथी विशाल है तो उससे लोग लड़ते ही क्यों है। दास जी बोले, चमचे। यह दोस्ती और दुश्मनी तो असल में नजरों का फेर ही है। कब बाहर वाला अंदर दोस्ती निभाये यह पता ही नहीं चलता। ऐसे दोस्तों को छुपा रुस्तम कहते हैं। रुस्तम कब छिपकर विभीषण बन जाए पता ही नहीं चलता।
अंत में दास जी बोले, बेटा दोस्त उसको मानना जो प्रभावशाली हो। दुश्मन उसको मानना जो तुम्हारा कुछ बिगाड़ न सके। इस सूत्र पर चले तो बल्ले-बल्ले होगी, वरना...
दास जी के इस गूढ़ वाक्य को सुनकर चमचे वाह-वाह कर उठे।
पंकुल
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8 टिप्पणियाँ:
बहुत ही ग्याण की बात बताई आप ने. हम धन्य हो गये
कुत्ते हैं वीर और महान
इंसानों से तुलना कर,
करो ना हमारा अपमान
रही हाथी की बात ,
बहुत बड़े अल्पज्ञानी हो
कहावत सुनी नही है क्या ?
हाथी के पावँ में सबके पावँ
हम कहावतों में छाए हैं
केवल कुत्ते मुकाबिल आए हैं
वे मगर बड़ेआदमी केकुत्ते कहाते
मगर हमें बाँध अपने द्वारे
लोग बड़े आदमी हैं कहाते |
आप ने हमारे 'क्षेत्र' में आने की
हिम्मत जो जुटाई है
उसका आ-भार उतारनेआया हूँ
गुर्रा कर जा रहा हूँ,आते रहियेगा
आकर प्यार से गुर्राते रहिएगा
अन्योनास्ति :कालचक्र में आयें चौपाल
'kaalchakra " men shanshodhan kar lenge
वाह पंकुल जी
आप भी कमाल हैं
साधुवाद
ऐसे दोस्तों को छुपा रुस्तम कहते हैं। रुस्तम कब छिपकर विभीषण बन जाए पता ही नहीं चलता।
" very well said, enjoyed reading it ya"
Regards
बहुत मजा आया पढ़ कर ! धन्यवाद !
आप तो चाणक्य नीति का पुनर्लेखन कर सकते हैं।
कमाल है।
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