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गुरुवार, 9 अक्तूबर 2008

बेतुकीः फिर निपट लिये रावण जी

फिर निपट लिये रावण जी। आपके सालाना निपटान दिवस पर आपके पुतले खूब धू-धू कर जले। अरे आपको साक्षात निपटाने की तो किसी में हिम्मत है नहीं। आपके पुतले को जलते हुए देखकर ही अपन तो पुरुषार्थ दिखा देते हैं।
भाई दसानन किसी जमाने में आपके दस सिर हुआ करते थे। आपने एक ही भूल की और अपने पूरे खानदान को मरवा दिया। हो सकता है आपकी यह गलती इन दस सिरों की वजह से ही हो गयी हो। अब दस-बारह पार्टियों के नेता सरकार बनाने के बाद भी एक जैसा नहीं सोच सकते तो आपके दस सिर कैसे सोच सकते थे। आपके किसी एक सिर ने सोचा होगा और आपने किडनेपिंग की योजना बना डाली। दूसरे सिर को इतना मौका तो दिया होता कि वो भले-बुरे की सोचता।
लंकाधिपति, आप अपनी सरकार चलाने के लिए कैसे सोचते थे। कम से कम इतना तो कर ही सकते हो कि थोड़ा सा ये गुर भी नेताओं को दे दो। नेताओं को आपने किडनेपिंग का गुर तो सिखा दिया। सीता हरण की तरह महिलाओं के अपहरण में भी निपुण बना दिया। मैंने सुना है आपके दस सिरों में एक सिर विद्वान का था। लगता है राम का वाण लगते ही आपके विद्वान सिर मुक्ति मिल गयी। बाकी बचे नौ सिर हर बार छह नये रूप में पुनर्जन्म लेते रहे। तभी तो आज आपके नौ सिरों के करोड़ों रूप पैदा हो गये। आपने लंका में घर बनाया था। अब तो हर शहर, हर गली में आपके नौ सिरों के अवतार पैदा हो गये हैं। सड़क चलते कब कौन सा रावणावतार प्रकट हो जाए पता नहीं।
जैसे आप वेश बदलने में माहिर थे, वैसे ही आपके अवतार भी हैं। कभी वोट की भिक्षा लेने के लिए घर-घर चक्कर लगाते हैं तो कभी किसी और रूप में।
हे रावण। इतनी शिक्षायें आपने दीं तो कम से कम एक शिक्षा और दे देते। आज के मिलीजुली सरकार के युग में एक सिर ऐसा पैदा कर देते जो कम से कम ढंग से सरकार तो चला लेता। हम आपको हर साल मारते रहेंगे। हर साल गली-मोहल्ले में तुम्हारा जुलूस निकालते रहेंगे जब तक तुम पूरे न निपट लो या हमें न निपटा दो। आपको निपटाने के लिए अभी तो राम जी को भी आने की फुर्सत नहीं दिख रही। यह भी हो सकता है इतने सारे रावणों को निपटाने में अकेले श्रीराम को प्राबलम आ रही हो। खैर, जो भी हो, हम तो इंतजार ही करेंगे।
पंकुल

5 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत बेतुकी से आप ने इतना सुन्दर लेख लिख दिया,बहुत ही अच्छा लगा , लेकिन रावण को तो अकल थी, उस ने अपने राज्य मे तो लोगो को खुश ओर सुखी रखा था, ओर आज के रावण इस जनता को ही खा रहै है, कोई रावाण किडनी निकाल रहा है, तो कोई गरीबो का खुन चुस रहा है,कई रावण तो चारा ही चर रहै है, ओर जब भुसा खायेगे तो दिमाग मेभी तो भुसा ही भरा होगा ना :) इस बेतुकी टिपण्णी के लिये माफ़ करना
धन्यवाद

dr. ashok priyaranjan ने कहा…

िवजयदशमी पवॆ की शुभकामनाएं ।
अच्छा िलखा है आपने

दशहरा पर मैने अपने ब्लाग पर एक िचंतनपरक आलेख िलखा है । उसके बारे में आपकी राय मेरे िलए महत्वपूणॆ होगी ।

http://www.ashokvichar.blogspot.com

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

बढिया व्यंग है । सही माने में रावण के ९ सिर बार बार पैदा हो रहे हैं ।

Zakir Ali 'Rajneesh' ने कहा…

भइये, लेकिन पता नहीं क्यों हमारे निपटाने में ही कुछ कमी रह जाती है शायद, जो हर साल फिर फिर आ धमकते हैं। दरअसल इन्हें अपने दिल से आत्मा से निपटाने की आवश्यकता है। शायद तभी यह पर्व ज्यादा सार्थक हो सके।

विनय राजपूत ने कहा…

bahut hi badiya vyanga hai .... hamare blog par aaye kabhi