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शुक्रवार, 1 अगस्त 2008

बचपन

जो खो गया कहीं
किसी नुक्कड़ या चौराहे पर वो
मेरा बचपन था
मिट्टयों के ढेर
और रेत के घरौंदे
जिन्हें तोड़कर खुद बनाया
इक पल रोया फिर मुस्कराया
वो मेरा बचपन था
बिल्लियों और बाबा का डर
परियों का लोक
आसमां के तारे और चांद
उन्हें पाने की हठ
वो मेरा बचपन था
घर के आंगन में स्वच्छंद विचरण
तितलियों के पीछे दौड़
न भूख का ख्याल न कोई आडम्बर
वो मेरा बचपन था
झूठ और सच का
तोल न मोल
खो गया किसी नुक्कड़ या चौराहे
पर वो मेरा बचपन था।।
पंकज कुलश्रेष्ठ

3 टिप्‍पणियां:

शोभा ने कहा…

वो मेरा बचपन था
बिल्लियों और बाबा का डर
परियों का लोक
आसमां के तारे और चांद
उन्हें पाने की हठ
बहुत सुन्दर लिखा है। बधाई।

महामंत्री-तस्लीम ने कहा…

बचपन खो भले जाए, पर दिल के किसी कोने में बचा जरूर रहता है और हमेशा हमें प्रेरणा प्रदान करता रहता है।

vipinkizindagi ने कहा…

"वो मेरा बचपन था
बिल्लियों और बाबा का डर"
सुन्दर........